बिहार में कोचिंग उद्योग बना 15 हजार करोड़ का विशाल बाजार, पटना में वर्चस्व की लड़ाई से बढ़ा विवाद
बिहार में कोचिंग उद्योग तेजी से बढ़कर लगभग 15 हजार करोड़ रुपये के विशाल बाजार में बदल गया है। पटना समेत राज्य के कई जिलों में हजारों कोचिंग सेंटर संचालित हो रहे हैं। हाल ही में पटना में हुई एक घटना के बाद कोचिंग संस्थानों के बीच प्रतिस्पर्धा और सुरक्षा को लेकर नए सवाल उठे हैं।
दि राइजिंग_न्यूज़ | पटना, बिहार | 1 जून 2026
बिहार की राजधानी अब केवल प्रशासनिक गतिविधियों का केंद्र नहीं रही, बल्कि यह एक ऐसे विशाल और अनियंत्रित औद्योगिक घराने में तब्दील हो चुकी है जो छात्रों के भविष्य की कीमत पर फल-फूल रहा है। राज्य में कोचिंग मंडी का कारोबार कोई साधारण शैक्षणिक गतिविधि नहीं है, बल्कि यह पंद्रह हजार करोड़ रुपये का एक ऐसा साम्राज्य बन चुका है जो युवाओं की लाचारी और सरकारी नौकरी की चाहत का फायदा उठाता है। लाखों बच्चों को सफलता का झूठा सपना बेचकर खड़ा किया गया यह तंत्र अब शिक्षा देने के बजाय माफियाओं के वर्चस्व की हिंसक जंग का मैदान बन चुका है, जिससे पूरा प्रदेश दहल उठा है।
मशहूर शिक्षक के संस्थान पर हमला और माफिया राज की हकीकत
बिहार का सबसे बड़ा शैक्षणिक केंद्र माना जाने वाला पटना का मुसल्लहपुर हाट इलाका हाल ही में एक भयंकर हिंसक घटना का गवाह बना, जिसने कानून व्यवस्था की धज्जियां उड़ा दीं। देश के विख्यात शिक्षक फैजल खान अर्थात खान सर के कोचिंग संस्थान 'खान ग्लोबल स्टडीज' के बाहर रात के अंधेरे में भारी अफरा-तफरी मच गई। संस्थान के बाहर ताबड़तोड़ आठ से दस राउंड गोलियां चलाई गईं और वहां तैनात सुरक्षाकर्मी को लहूलुहान होने तक बर्बरतापूर्वक पीटा गया, जिसके बाद उसे अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। हालांकि पुलिस प्रशासन ने हमेशा की तरह इस खूनी खेल की गंभीरता को दबाने का प्रयास किया, परंतु जांच के बाद ज्ञान बिंदु संस्थान के संचालक सहित तीन लोगों की गिरफ्तारी ने यह साबित कर दिया कि शिक्षा के नाम पर यहां शुद्ध रूप से माफिया गिरोह सक्रिय हैं।
आंकड़ों की खौफनाक हकीकत: छह हजार से अधिक केंद्रों के जाल में फंसता युवाओं का भविष्य
इस राज्य में कोचिंग का धंधा किस कदर एक मकड़जाल की तरह फैल चुका है, इसका अंदाजा हाल ही में आए आधिकारिक सांख्यिकीय आंकड़ों से आसानी से लगाया जा सकता है। वर्तमान समय में संपूर्ण बिहार के भीतर छह हजार तीन सौ त्रासी कोचिंग संस्थान धड़ल्ले से संचालित हो रहे हैं, जो पिछले वर्षों की तुलना में अत्यधिक तेजी से बढ़े हैं। इस पूरे खेल का मुख्य केंद्र पटना बना हुआ है जहां अकेले एक हजार दो सौ छप्पन केंद्र चल रहे हैं, जबकि मुजफ्फरपुर और गया जैसे शहर भी इस दौड़ में पीछे नहीं हैं। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इनमें से लगभग तिरानबे प्रतिशत संस्थान एकल मालिकाना हक के तहत बेरोकटोक चलाए जा रहे हैं, जो बिना किसी जवाबदेही के छात्रों से मोटी रकम वसूलने का काम करते हैं।
अरबों का टर्नओवर: शिक्षा के नाम पर सवा लाख रुपये सालाना की खुली लूट
बिहार की इस कोचिंग मंडी का वास्तविक आर्थिक आकार किसी भी बड़े कारपोरेट घराने को मात देने की क्षमता रखता है, जो सीधे तौर पर अभिभावकों की जेब पर डाका है। एक वैश्विक रिपोर्ट के अनुसार देश भर में यह धंधा साठ हजार करोड़ रुपये का है, जिसमें बिहार एक बहुत बड़े हिस्सेदार के रूप में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज करा रहा है। यहां के निजी संस्थानों का घोषित वार्षिक कारोबार भले ही करोड़ों में दिखाया जाता हो, परंतु धरातल की कड़वी सच्चाई यह है कि यह बाजार पंद्रह हजार करोड़ रुपये के आंकड़े को पार कर चुका है। प्रत्येक छात्र को प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कराने के नाम पर सालाना औसतन सवा लाख रुपये खर्च करने के लिए मजबूर किया जाता है, जो पूरी तरह से एक संगठित वित्तीय शोषण है।
रोजगार का छलावा: अल्प वेतन पर शिक्षकों का शोषण और पूर्वी भारत में बढ़ता संकट
इस पूरे अनियंत्रित तंत्र को रोजगार सृजन के एक बड़े माध्यम के रूप में प्रस्तुत करके सरकारें और संस्थान अपनी पीठ थपथपाने का काम करते हैं, जो एक बड़ा छलावा है। कोचिंग संस्थानों में काम करने वाले शैक्षणिक मार्गदर्शकों का औसत वार्षिक वेतन मात्र पौने पांच लाख रुपये के आसपास है, जबकि शुरुआती स्तर पर युवाओं को दो लाख रुपये जैसी मामूली रकम पर खटवाया जाता है। संपूर्ण देश की तुलना में पूर्वी भारत इस समय कोचिंग के सबसे खतरनाक दौर से गुजर रहा है, जहां त्रिपुरा, पश्चिम बंगाल और ओडिशा के साथ बिहार के बावन प्रतिशत से अधिक बच्चे इस दलदल में फंसे हैं। राष्ट्रीय औसत महज सत्ताइस प्रतिशत है, परंतु बिहार में यह आंकड़ा दोगुना होना यह दर्शाता है कि यहां की मूल स्कूली शिक्षा प्रणाली पूरी तरह ध्वस्त हो चुकी है।
सरकारी तंत्र की विफलता: कड़े नियमों के दावों के बीच फल-फूल रहा अवैध धंधा
बिहार सरकार खुद को देश का पहला ऐसा राज्य घोषित करती है जिसने वर्ष दो हजार दस में कोचिंग संस्थानों को नियंत्रित करने के लिए विशेष विनियमन अधिनियम कानून लागू किया था। अब इस घटना के बाद प्रशासन फिर से अनिवार्य पंजीकरण, पंद्रह हजार रुपये शुल्क और बिना पंजीकरण पकड़े जाने पर एक लाख रुपये के भारी जुर्माने का ढिंढोरा पीट रहा है। इसके साथ ही प्रत्येक छात्र के लिए दो वर्ग फीट की जगह, शिक्षकों के लिए स्नातक की डिग्री की अनिवार्यता और सफल छात्रों की तस्वीरों के भ्रामक प्रचार पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने जैसे कागजी दावे किए जा रहे हैं। परंतु सच तो यह है कि जमीनी स्तर पर पुलिस और प्रशासन की नाक के नीचे बिना किसी जांच और सत्यापन के यह अवैध कारोबार फल-फूल रहा है, जिसे रोकने में सरकारी नीतियां पूरी तरह विफल रही हैं।