गरीबी ने छीनी लाखों बेटियों की पढ़ाई, रुपयों की कमी और घरेलू बोझ से टूट रहे सपने...
भारत में आर्थिक तंगी, घरेलू जिम्मेदारियों और सामाजिक दबाव के कारण हर साल लाखों बच्चियां पढ़ाई बीच में छोड़ने को मजबूर हो रही हैं। रिपोर्ट के मुताबिक बिहार, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में स्कूल छोड़ने वाले बच्चों की संख्या सबसे ज्यादा है। संयुक्त राष्ट्र बाल कोष की रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि घरेलू काम और गरीबी लड़कियों की शिक्षा में सबसे बड़ी बाधा बन रहे हैं। सरकार ने राज्यों को विशेष योजनाएं और शिक्षा सुधार लागू करने के निर्देश दिए हैं।
दि राइजिंग न्यूज़ | नई दिल्ली | 27 मई 2026
भारत में शिक्षा को लेकर लगातार बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत आज भी बेहद चिंताजनक बनी हुई है। देशभर में लाखों बच्चियां ऐसी हैं जो गरीबी, घरेलू जिम्मेदारियों और सामाजिक दबाव के कारण अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़ने को मजबूर हो रही हैं। कई परिवार आर्थिक तंगी के चलते बेटियों की पढ़ाई को बोझ मानने लगे हैं। हालात इतने खराब हैं कि छोटी उम्र में ही बच्चियों को घर के काम, मजदूरी और छोटे भाई-बहनों की देखभाल में लगा दिया जाता है। लगातार बढ़ते ड्रॉपआउट के आंकड़े देश की शिक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर रहे हैं।
दो साल में लाखों बच्चों ने छोड़ा स्कूल
रिपोर्ट के मुताबिक दो हजार बाईस तेइस से दो हजार तेइस चौबीस के बीच देशभर में लाखों बच्चों ने प्राथमिक और उच्च प्राथमिक स्तर पर पढ़ाई बीच में छोड़ दी। आंकड़ों में लड़कों की संख्या ज्यादा दिखाई गई है, लेकिन कई राज्यों में लड़कियों की स्थिति बेहद चिंताजनक बनी हुई है। विशेषज्ञों का कहना है कि ग्रामीण इलाकों में बेटियों की शिक्षा आज भी परिवारों की प्राथमिकता नहीं बन पाई है। स्कूलों की दूरी, खराब सड़कें और सुरक्षा की चिंता के कारण कई परिवार बच्चियों को आगे पढ़ाने से बचते हैं।
बिहार में सबसे ज्यादा बच्चे शिक्षा से दूर
देश में सबसे ज्यादा स्कूल छोड़ने वाले बच्चों की संख्या बिहार में दर्ज की गई है। रिपोर्ट के अनुसार बिहार में करीब सत्ताईस लाख उनहत्तर हजार से ज्यादा बच्चों ने पढ़ाई बीच में छोड़ दी। इसके बाद राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और असम जैसे राज्यों का नाम सामने आया है। राजस्थान में लगभग आठ लाख निन्यानवे हजार, उत्तर प्रदेश में सात लाख इकतालीस हजार, मध्य प्रदेश में तीन लाख सैंतीस हजार और असम में तीन लाख अट्ठावन हजार बच्चे स्कूल से बाहर हो गए। इन राज्यों में गरीबी, बेरोजगारी और कमजोर शिक्षा व्यवस्था को सबसे बड़ा कारण माना जा रहा है।
घरेलू कामों ने छीना लाखों बच्चियों का बचपन
संयुक्त राष्ट्र बाल कोष की रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि बड़ी संख्या में लड़कियां घरेलू जिम्मेदारियों की वजह से पढ़ाई छोड़ रही हैं। करीब तैंतीस प्रतिशत बच्चियां ऐसी हैं जिन्हें घर के कामकाज और छोटे भाई-बहनों की देखभाल के कारण स्कूल छोड़ना पड़ा। कई परिवारों में बेटियों को कम उम्र से ही खाना बनाना, सफाई करना और घर संभालने जैसे कामों में लगा दिया जाता है। आर्थिक तंगी वाले परिवारों में कई बच्चियों को मजदूरी या घरेलू नौकरानी के रूप में भी काम करना पड़ता है।
छोटी उम्र में शादी भी बड़ी वजह
ग्रामीण इलाकों में आज भी कम उम्र में शादी की परंपरा बच्चियों की शिक्षा के रास्ते में सबसे बड़ी बाधा बनी हुई है। कई परिवार बेटियों की पढ़ाई छुड़ाकर कम उम्र में ही उनकी शादी कर देते हैं। शादी के बाद बच्चियों की शिक्षा पूरी तरह रुक जाती है और उनका जीवन घरेलू जिम्मेदारियों तक सीमित होकर रह जाता है। सामाजिक विशेषज्ञों का कहना है कि जब तक बाल विवाह जैसी कुप्रथाओं पर पूरी तरह रोक नहीं लगेगी तब तक लड़कियों की शिक्षा प्रभावित होती रहेगी।
उत्तर प्रदेश में लड़कियों की स्थिति ज्यादा खराब
उत्तर प्रदेश में प्राथमिक और उच्च प्राथमिक स्तर पर लड़कियों के स्कूल छोड़ने की दर लड़कों से ज्यादा दर्ज की गई है। खासकर छठी से आठवीं कक्षा के बीच बड़ी संख्या में बच्चियां पढ़ाई छोड़ रही हैं। कई परिवारों का मानना है कि बेटियों को ज्यादा पढ़ाने की जरूरत नहीं है। वहीं स्कूलों की दूरी और सुरक्षा की कमी भी एक बड़ी वजह बन रही है। ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी कई लड़कियां सिर्फ इसलिए पढ़ाई छोड़ देती हैं क्योंकि स्कूल तक पहुंचने के लिए उन्हें लंबी दूरी तय करनी पड़ती है।
मुस्लिम और आदिवासी समुदाय में ज्यादा असर
रिपोर्ट के अनुसार राजस्थान और कुछ अन्य राज्यों में मुस्लिम और आदिवासी समुदाय की बच्चियों में ड्रॉपआउट दर ज्यादा पाई गई है। विशेषज्ञों का कहना है कि इन समुदायों में आर्थिक कमजोरी और शिक्षा को लेकर जागरूकता की कमी सबसे बड़ी वजह है। कई इलाकों में सरकारी योजनाओं का लाभ भी जरूरतमंद परिवारों तक पूरी तरह नहीं पहुंच पा रहा है। इसके कारण बच्चियों का भविष्य अंधकार की ओर बढ़ता जा रहा है।
केरल और तमिलनाडु ने पेश की बेहतर मिसाल
जहां कई राज्य शिक्षा व्यवस्था में पिछड़ते नजर आ रहे हैं, वहीं केरल, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों ने बेहतर प्रदर्शन किया है। इन राज्यों में स्कूल छोड़ने वाले बच्चों की संख्या बेहद कम बताई गई है। विशेषज्ञों का कहना है कि मजबूत सरकारी स्कूल, जागरूकता अभियान और बेहतर सामाजिक माहौल के कारण इन राज्यों में लड़कियों की शिक्षा को बढ़ावा मिला है। हालांकि कुछ विशेषज्ञों ने आंकड़ों की दोबारा जांच की जरूरत भी बताई है।
सरकार ने राज्यों को दिए सख्त निर्देश
केंद्र सरकार ने ज्यादा ड्रॉपआउट वाले राज्यों को विशेष कदम उठाने की सलाह दी है। सरकार ने गरीब छात्रों को आर्थिक सहायता देने, लड़कियों के लिए विशेष योजनाएं चलाने और ग्रामीण इलाकों में स्कूल सुविधाएं बेहतर बनाने पर जोर दिया है। इसके अलावा जो बच्चे पढ़ाई छोड़ चुके हैं उन्हें दोबारा स्कूल से जोड़ने के लिए विशेष अभियान चलाने की बात कही गई है। सरकार का कहना है कि यदि समय रहते हालात नहीं सुधरे तो देश की बड़ी आबादी शिक्षा से वंचित रह जाएगी।
शिक्षा से दूर होती बेटियां देश के भविष्य के लिए खतरा
यदि बच्चियों की शिक्षा इसी तरह प्रभावित होती रही तो इसका असर पूरे देश के भविष्य पर पड़ेगा। शिक्षा सिर्फ रोजगार का माध्यम नहीं बल्कि समाज को मजबूत बनाने का सबसे बड़ा हथियार है। जब बेटियां पढ़ेंगी तभी परिवार और देश दोनों मजबूत होंगे। लेकिन आज भी लाखों बच्चियां सिर्फ गरीबी और सामाजिक सोच की वजह से अपने सपनों को अधूरा छोड़ने पर मजबूर हैं। यही वजह है कि शिक्षा व्यवस्था और सरकारी योजनाओं को जमीन पर प्रभावी तरीके से लागू करने की मांग लगातार तेज हो रही है।