13 साल में दोगुनी हुई गर्मी की मार
जलवायु परिवर्तन का असर भारत में तेजी से दिखाई दे रहा है। पिछले 13 वर्षों में हीटवेव के दिनों की संख्या लगभग दोगुनी हो गई है। बढ़ती गर्मी से स्वास्थ्य, खेती और अर्थव्यवस्था पर गंभीर असर पड़ रहा है।
दि राइजिंग न्यूज़ | नई दिल्ली | 12 जून 2026
भारत में बढ़ती गर्मी अब सिर्फ मौसम का बदलाव नहीं रह गई है, बल्कि यह जलवायु संकट का बड़ा संकेत बन चुकी है। पिछले कुछ वर्षों में देश में हीटवेव यानी गर्म हवा और लू के दिनों में लगातार बढ़ोतरी दर्ज की गई है। आंकड़े बताते हैं कि पिछले 13 वर्षों में भारत में हीटवेव के दिनों की संख्या लगभग दोगुनी हो चुकी है। पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार, साल 2013 में भारत में करीब 100 दिन हीटवेव दर्ज किए गए थे, जबकि अब यह संख्या बढ़कर 200 दिनों के पार पहुंच चुकी है। यह बदलाव बताता है कि बढ़ता तापमान और मौसम के बदलते पैटर्न भारत के लिए बड़ी चुनौती बन रहे हैं।
2024 में रिकॉर्ड स्तर पर पहुंची हीटवेव
सरकार की ओर से संसद में दिए गए आंकड़ों के अनुसार, साल 2024 में भारतीय क्षेत्र में 554 हीटवेव दिन दर्ज किए गए। वहीं 2023 में यह आंकड़ा करीब 230 दिन था। सिर्फ एक साल में इतनी बड़ी बढ़ोतरी ने चिंता बढ़ा दी है। मौसम विशेषज्ञों के अनुसार, बढ़ती गर्मी के पीछे वैश्विक तापमान में वृद्धि और स्थानीय मौसम बदलाव मुख्य कारण हैं।
हीटवेव क्या होती है
भारतीय मौसम विभाग के अनुसार, जब किसी क्षेत्र का अधिकतम तापमान सामान्य से 4.5 डिग्री सेल्सियस या उससे ज्यादा बढ़ जाए और यह स्थिति कम से कम दो दिन तक बनी रहे, तो उसे हीटवेव माना जाता है। मैदानी इलाकों में तापमान 40 डिग्री सेल्सियस से ऊपर और पहाड़ी क्षेत्रों में 30 डिग्री सेल्सियस से ऊपर पहुंचने पर गर्मी का खतरा बढ़ जाता है। हीटवेव सिर्फ सामान्य गर्मी नहीं होती, बल्कि यह शरीर के लिए खतरनाक स्थिति पैदा कर सकती है। इससे लू लगना, शरीर में पानी की कमी, हृदय संबंधी समस्या और गंभीर स्वास्थ्य परेशानियां हो सकती हैं।
गर्मी का असर अब लंबे समय तक रहने लगा
पहले हीटवेव का असर मुख्य रूप से अप्रैल और मई तक सीमित रहता था, लेकिन अब इसका प्रभाव मार्च से जून तक दिखाई देने लगा है। कई बार जुलाई में भी गर्म हवाओं का असर देखने को मिलता है। उत्तर भारत, राजस्थान, गुजरात, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और पूर्वी भारत के कई इलाकों में गर्मी की अवधि और तीव्रता लगातार बढ़ रही है।
जलवायु परिवर्तन सबसे बड़ा कारण
विशेषज्ञों के अनुसार, जलवायु परिवर्तन ही बढ़ती हीटवेव का प्रमुख कारण है। भारत का औसत तापमान पिछले वर्षों में करीब 0.6 से 0.7 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ चुका है। कार्बन डाइऑक्साइड और मीथेन जैसी ग्रीनहाउस गैसों की बढ़ती मात्रा पृथ्वी के तापमान को बढ़ा रही है। जंगलों की कटाई, बढ़ता शहरीकरण, औद्योगीकरण और जीवाश्म ईंधन का ज्यादा इस्तेमाल इस समस्या को और गंभीर बना रहे हैं।
कई राज्य बने हीटवेव हॉटस्पॉट
उत्तर भारत में दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और बिहार सबसे ज्यादा प्रभावित क्षेत्रों में शामिल हैं। राजस्थान और गुजरात जैसे पश्चिमी राज्यों में लंबे समय तक 45 से 48 डिग्री सेल्सियस तक तापमान पहुंच रहा है। मध्य भारत और दक्षिण भारत के कई हिस्सों में भी नए गर्मी प्रभावित क्षेत्र सामने आ रहे हैं। शहरों में शहरी गर्मी प्रभाव के कारण रात का तापमान भी कम नहीं हो पाता, जिससे लोगों को राहत नहीं मिलती।
सेहत पर बढ़ रहा खतरा
हीटवेव का सबसे ज्यादा असर बुजुर्गों, बच्चों, मजदूरों और कमजोर वर्गों पर पड़ता है। लंबे समय तक तेज गर्मी रहने से हीट स्ट्रोक, शरीर में पानी की कमी, हृदय रोग और किडनी से जुड़ी समस्याएं बढ़ सकती हैं। 2015 में भारत में आई भीषण गर्मी के दौरान हजारों लोग प्रभावित हुए थे और बड़ी संख्या में मौतें दर्ज की गई थीं।
खेती और अर्थव्यवस्था पर भी असर
बढ़ती गर्मी का असर खेती पर भी पड़ रहा है। गेहूं, चावल, फल और सब्जियों की पैदावार प्रभावित हो रही है। पशुधन पर भी गर्मी का असर दिखाई दे रहा है। जल संकट भी बढ़ रहा है क्योंकि गर्मी के कारण पानी की मांग बढ़ती है और भूजल स्तर पर दबाव बढ़ता है। मजदूरों की काम करने की क्षमता कम होती है, बिजली की खपत बढ़ती है और इससे अर्थव्यवस्था पर भी असर पड़ता है।
आने वाले समय के लिए बड़ी चेतावनी
भारत में बढ़ते हीटवेव दिन जलवायु संकट की गंभीर चेतावनी हैं। 13 साल में 100 से 200 दिनों तक पहुंचा यह बदलाव आने वाले वर्षों की चुनौती को दिखाता है। अगर समय रहते पर्यावरण संरक्षण, उत्सर्जन नियंत्रण और गर्मी से बचाव की योजनाओं पर काम नहीं किया गया तो भविष्य में गर्मी का संकट और ज्यादा गंभीर हो सकता है