सुप्रीम कोर्ट बोला शादी नौकरानी लाने का नाम नहीं

सुप्रीम कोर्ट ने गृहणियों के योगदान को लेकर अहम टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि महिलाएं सिर्फ घर संभालने वाली नहीं बल्कि राष्ट्र निर्माण में अहम भूमिका निभाने वाली नेशन बिल्डर हैं।

सुप्रीम कोर्ट बोला शादी नौकरानी लाने का नाम नहीं

दि राइजिंग न्यूज़ | नई दिल्ली | 12 जून 2026

सुप्रीम कोर्ट ने गृहणियों यानी घर संभालने वाली महिलाओं के योगदान को लेकर एक अहम और महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने कहा कि घर और परिवार की जिम्मेदारी निभाने वाली महिलाओं के काम को केवल घरेलू काम समझकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि महिलाएं केवल घर की देखभाल करने वाली नहीं हैं, बल्कि वह परिवार के साथ-साथ देश के मानव संसाधन और राष्ट्र निर्माण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। इसलिए उन्हें सिर्फ होममेकर कहने के बजाय नेशन बिल्डर के रूप में देखा जाना चाहिए।

शादी का मतलब नौकरानी लाना नहीं

जस्टिस संजय करोल की अध्यक्षता वाली पीठ ने टिप्पणी करते हुए कहा कि शादी का अर्थ यह नहीं है कि कोई व्यक्ति घर में काम करने के लिए नौकरानी लेकर आए। अदालत ने कहा कि घर के काम, परिवार की जिम्मेदारियां और बच्चों की देखभाल पति और पत्नी दोनों की साझा जिम्मेदारी है। गृहिणी का योगदान परिवार की नींव मजबूत करने में होता है और इसे किसी भी तरह कम नहीं आंका जा सकता।

महिलाओं की अपनी पहचान बनी रहती है

सुप्रीम कोर्ट ने महिलाओं के करियर और व्यक्तिगत पहचान को लेकर भी महत्वपूर्ण बात कही। अदालत ने कहा कि शादी के बाद महिला की पहचान खत्म नहीं हो जाती। अगर कोई महिला अपने पेशेवर जीवन को आगे बढ़ाना चाहती है और अपने बच्चे के लिए बेहतर माहौल बनाना चाहती है, तो इसे पति या ससुराल वालों के खिलाफ कदम नहीं माना जा सकता। अदालत ने कहा कि महिला का अपने करियर को जारी रखना किसी तरह की क्रूरता नहीं है।

गृहिणियों के काम का आर्थिक महत्व

सुप्रीम कोर्ट ने माना कि गृहिणियां अपना समय, मेहनत और ऊर्जा परिवार के लिए समर्पित करती हैं। बच्चों की परवरिश, परिवार का प्रबंधन और आने वाली पीढ़ी को तैयार करने में उनकी भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती है। अदालत ने कहा कि गृहिणियों के योगदान को सामाजिक और आर्थिक दोनों नजरिए से मान्यता मिलनी चाहिए।

पारिवारिक संपत्ति में अधिकार पर भी टिप्पणी

अदालत ने कहा कि गृहिणियों का योगदान सिर्फ घर के काम तक सीमित नहीं है। परिवार के विकास में उनकी भूमिका होती है, इसलिए संयुक्त रूप से खरीदी गई पारिवारिक संपत्तियों में उनके अधिकारों को भी महत्व दिया जाना चाहिए।

हादसे में मौत पर मुआवजे के लिए नई गाइडलाइन

सुप्रीम कोर्ट ने सड़क दुर्घटनाओं में गृहिणियों की मौत या चोट लगने के मामलों में मुआवजे को लेकर नई गाइडलाइन भी तय की है। अदालत ने कहा कि जब किसी परिवार की गृहिणी किसी हादसे के कारण नहीं रहती, तो सिर्फ उसकी आय को नहीं बल्कि उसके घरेलू योगदान को भी मुआवजा तय करते समय ध्यान में रखना होगा। सुप्रीम कोर्ट ने घरेलू देखभाल के नुकसान का न्यूनतम मूल्य 30 हजार रुपये प्रति माह तय किया है।

घरेलू योगदान को मुआवजे में शामिल करना जरूरी

अदालत ने कहा कि मुआवजे की गणना करते समय महिला के घरेलू काम, परिवार की देखभाल और भविष्य में उसके योगदान को भी शामिल किया जाना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि गृहिणी का काम सीधे वेतन से नहीं जुड़ा होता, लेकिन उसका महत्व परिवार और समाज दोनों के लिए बहुत बड़ा होता है।

हाई कोर्ट को समय पर फैसले का निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने सभी हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीशों से कहा है कि वह मोटर दुर्घटना मुआवजा मामलों की निगरानी करें, ताकि पीड़ित परिवारों को समय पर न्याय मिल सके। अदालत ने उम्मीद जताई कि ऐसे मामलों का निपटारा तय समय सीमा के अंदर तेजी से किया जाएगा। यह फैसला महिलाओं के घरेलू योगदान को कानूनी और सामाजिक पहचान देने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।