अमेरिका के अतिरिक्त शुल्क पर भारत का करारा पलटवार!
अमेरिका द्वारा भारतीय उत्पादों पर प्रस्तावित बारह दशमलव पाँच प्रतिशत अतिरिक्त आयात शुल्क के विरोध में भारत ने कड़ा रुख अपनाया है। भारत ने कहा है कि व्यापारिक विवादों का समाधान एकतरफा निर्णयों से नहीं, बल्कि आपसी बातचीत और द्विपक्षीय वार्ता के माध्यम से होना चाहिए। सरकार ने अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि से प्रस्ताव पर पुनर्विचार करने की अपील करते हुए जांच रिपोर्ट को तथ्यों और पर्याप्त साक्ष्यों से रहित बताया है।
दि राइजिंग न्यूज़ | नई दिल्ली |11 जुलाई 2026
अमेरिका द्वारा भारतीय उत्पादों पर प्रस्तावित बारह दशमलव पाँच प्रतिशत अतिरिक्त आयात शुल्क के प्रस्ताव पर भारत ने कड़ी आपत्ति दर्ज कराई है। भारत ने स्पष्ट किया है कि दोनों देशों के बीच व्यापार से जुड़े किसी भी विवाद का समाधान एकतरफा निर्णयों या दंडात्मक कदमों के बजाय आपसी संवाद, सहयोग और द्विपक्षीय वार्ता के माध्यम से होना चाहिए। भारत ने अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि से इस प्रस्ताव पर पुनर्विचार करने की अपील करते हुए कहा कि जांच रिपोर्ट में कई कानूनी और तथ्यात्मक कमियां मौजूद हैं। सरकार का कहना है कि भारत जबरन श्रम जैसी किसी भी गतिविधि के खिलाफ सख्त कानून लागू करता है और अंतरराष्ट्रीय मानकों का पूरी तरह पालन करता है।
अमेरिका के अतिरिक्त शुल्क प्रस्ताव पर भारत की कड़ी प्रतिक्रिया
भारत सरकार ने अमेरिका द्वारा भारतीय उत्पादों पर प्रस्तावित अतिरिक्त आयात शुल्क को लेकर गंभीर चिंता व्यक्त की है। सरकार का कहना है कि यह प्रस्ताव दोनों देशों के वर्षों पुराने मजबूत व्यापारिक संबंधों को प्रभावित कर सकता है। भारत ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि किसी भी प्रकार का व्यापारिक विवाद आपसी बातचीत, विश्वास और सहयोग के माध्यम से सुलझाया जाना चाहिए, न कि एकतरफा निर्णय लेकर किसी एक देश पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ डालना उचित है।सार्वजनिक सुनवाई के दौरान भारत की ओर से वाणिज्य विभाग के संयुक्त सचिव बृज मोहन मिश्रा ने कहा कि भारत हमेशा निष्पक्ष और नियम आधारित वैश्विक व्यापार व्यवस्था का समर्थन करता है। उन्होंने कहा कि भारत अमेरिका के साथ अपने आर्थिक संबंधों को और मजबूत करना चाहता है, लेकिन इसके लिए दोनों देशों के बीच समानता और पारदर्शिता के आधार पर निर्णय होना आवश्यक है। भारत ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी भी जांच का आधार ठोस साक्ष्य होना चाहिए।
जबरन श्रम संबंधी आरोपों को भारत ने बताया पूरी तरह निराधार
सार्वजनिक सुनवाई के दौरान भारत ने जबरन श्रम से जुड़े आरोपों को पूरी तरह निराधार और तथ्यों से परे बताया। भारत ने कहा कि देश में श्रमिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए मजबूत कानूनी व्यवस्था लागू है और किसी भी प्रकार के जबरन श्रम को कानून के तहत अपराध माना जाता है। सरकार लगातार श्रमिकों की सुरक्षा, उचित मजदूरी और सम्मानजनक कार्य परिस्थितियां सुनिश्चित करने की दिशा में काम कर रही है।भारत ने कहा कि अमेरिकी जांच रिपोर्ट में लगाए गए आरोप सामान्य अनुमानों पर आधारित हैं और किसी भी भारतीय उद्योग या उत्पाद के विरुद्ध ठोस प्रमाण प्रस्तुत नहीं किए गए हैं। केवल यह कहना कि किसी देश में जबरन श्रम से बने उत्पादों के आयात पर पर्याप्त रोक नहीं है, किसी भी प्रकार की व्यापारिक कार्रवाई का आधार नहीं बन सकता।
जांच प्रक्रिया और कानूनी आधार पर भारत ने उठाए गंभीर सवाल
भारत ने अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि द्वारा की गई जांच प्रक्रिया पर भी गंभीर सवाल उठाए हैं। भारत का कहना है कि इस जांच में उन कानूनी मानकों का पूरी तरह पालन नहीं किया गया जिनका पालन इस प्रकार की कार्रवाई से पहले आवश्यक होता है। सरकार ने कहा कि किसी भी देश के विरुद्ध व्यापारिक प्रतिबंध लगाने से पहले निष्पक्ष जांच और पर्याप्त साक्ष्य होना अनिवार्य है।भारत ने कहा कि जांच रिपोर्ट में जिन निष्कर्षों को आधार बनाया गया है, वे व्यापक और ठोस प्रमाणों से समर्थित नहीं हैं। रिपोर्ट में केवल कुछ सामान्य उदाहरणों और वैश्विक व्यापारिक आंकड़ों के आधार पर निष्कर्ष निकाल दिए गए हैं, जबकि भारत के संदर्भ में कोई स्पष्ट और प्रत्यक्ष प्रमाण उपलब्ध नहीं कराया गया।सरकार का मानना है कि अंतरराष्ट्रीय व्यापार से जुड़े मामलों में पारदर्शिता, निष्पक्षता और कानूनी प्रक्रिया का पालन सबसे महत्वपूर्ण होता है। यदि इन सिद्धांतों की अनदेखी की जाती है तो इससे वैश्विक व्यापार प्रणाली की विश्वसनीयता प्रभावित हो सकती है।
सभी देशों को एक समान श्रेणी में रखने पर भारत की आपत्ति
भारत ने अमेरिकी रिपोर्ट में अनेक देशों को एक ही श्रेणी में शामिल करने के तरीके पर भी कड़ी आपत्ति जताई है। भारत का कहना है कि प्रत्येक देश की आर्थिक स्थिति, उद्योगों की संरचना, श्रम कानून और व्यापारिक व्यवस्था अलग-अलग होती है। ऐसे में सभी देशों पर एक जैसा नियम लागू करना उचित नहीं माना जा सकता।भारत ने कहा कि किसी भी देश का मूल्यांकन उसकी अपनी परिस्थितियों, कानूनी ढांचे और व्यापारिक व्यवहार के आधार पर किया जाना चाहिए। यदि अलग-अलग परिस्थितियों वाले देशों को एक ही मानक से परखा जाएगा तो निष्पक्ष परिणाम सामने नहीं आ सकते।सरकार ने यह भी कहा कि अमेरिका को प्रत्येक देश की वास्तविक स्थिति का अलग-अलग अध्ययन करना चाहिए ताकि कोई भी निर्णय तथ्यों और प्रमाणों के आधार पर लिया जा सके।
भारतीय उद्योग को अनुचित लाभ मिलने के दावों का भारत ने किया खंडन
भारत ने अमेरिकी रिपोर्ट में लगाए गए इस आरोप को भी अस्वीकार कर दिया कि भारतीय नीतियों के कारण अमेरिकी उद्योगों को नुकसान हो रहा है। सरकार का कहना है कि भारतीय उद्योग अपनी गुणवत्ता, प्रतिस्पर्धी क्षमता और मेहनत के बल पर वैश्विक बाजार में स्थान बना रहे हैं, न कि किसी अनुचित सरकारी सहायता या गलत व्यापारिक नीति के कारण।भारत ने कहा कि रिपोर्ट में ऐसा कोई ठोस प्रमाण नहीं दिया गया जिससे यह साबित हो सके कि भारतीय उत्पादों को अनुचित लाभ मिल रहा है या अमेरिकी उद्योगों को वास्तविक नुकसान पहुंच रहा है। इसलिए अतिरिक्त शुल्क लगाने का प्रस्ताव तथ्यात्मक रूप से कमजोर दिखाई देता है।सरकार ने कहा कि भारत निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा में विश्वास करता है और विश्व व्यापार के सभी नियमों का पालन करता है। ऐसे में भारतीय उद्योगों पर अतिरिक्त शुल्क लगाना न्यायसंगत नहीं कहा जा सकता।
चावल आयात और निर्यात को लेकर भारत ने रखा विस्तृत पक्ष
भारतीय दूतावास की ओर से प्रथम सचिव श्रेयांस गुप्ता ने चावल व्यापार से जुड़े अमेरिकी दावों का विस्तार से जवाब दिया। उन्होंने बताया कि भारत में चावल का आयात अत्यंत सीमित मात्रा में होता है और यह केवल विशेष किस्मों की घरेलू मांग को पूरा करने के लिए किया जाता है। इसका कुल व्यापार में बहुत छोटा योगदान है।उन्होंने कहा कि भारत से अमेरिका को निर्यात किए जाने वाले चावल की तुलना में आयात किए गए चावल का मूल्य तीन प्रतिशत से भी कम है। इसलिए यह दावा कि भारत बड़े पैमाने पर जबरन श्रम से उत्पादित चावल का आयात करता है, वास्तविक तथ्यों से मेल नहीं खाता।भारत ने यह भी स्पष्ट किया कि देश में कृषि उत्पादों के निर्यात के लिए सख्त नियम लागू हैं। केवल कृषि मंत्रालय में पंजीकृत चावल मिलों और प्रसंस्करण इकाइयों को ही निर्यात की अनुमति दी जाती है। इससे यह सुनिश्चित किया जाता है कि निर्यात होने वाले उत्पाद सभी कानूनी और गुणवत्ता मानकों का पालन करें।
उद्योग संगठनों ने भी अतिरिक्त शुल्क का किया विरोध
देश के प्रमुख उद्योग संगठनों ने भी अमेरिकी प्रस्ताव का विरोध किया है। उनका कहना है कि अतिरिक्त शुल्क लगाने से केवल भारतीय निर्यातकों को ही नुकसान नहीं होगा, बल्कि अमेरिकी आयातकों, विनिर्माताओं, खुदरा व्यापारियों और उपभोक्ताओं पर भी आर्थिक बोझ बढ़ेगा।उद्योग संगठनों का मानना है कि अतिरिक्त शुल्क लागू होने से व्यापारिक लागत बढ़ेगी, वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि होगी और दोनों देशों के बीच वर्षों से विकसित आपूर्ति श्रृंखला प्रभावित होगी। इसका असर वैश्विक व्यापार पर भी देखने को मिल सकता है।उन्होंने कहा कि भारत की कानूनी व्यवस्था, उद्योगों द्वारा अपनाए गए गुणवत्ता मानकों और दोनों देशों के मजबूत व्यापारिक संबंधों को देखते हुए इस प्रस्ताव पर पुनर्विचार किया जाना चाहिए।
द्विपक्षीय वार्ता को बताया सबसे प्रभावी समाधान
भारत ने एक बार फिर दोहराया कि किसी भी व्यापारिक विवाद का समाधान बातचीत, सहयोग और आपसी विश्वास के माध्यम से ही संभव है। सरकार का कहना है कि भारत और अमेरिका लंबे समय से रणनीतिक और आर्थिक साझेदार रहे हैं तथा दोनों देशों के बीच व्यापार लगातार बढ़ रहा है।भारत ने अमेरिका को भरोसा दिलाया कि यदि किसी विषय पर कोई वास्तविक चिंता है तो भारत उस पर खुलकर चर्चा करने और समाधान निकालने के लिए पूरी तरह तैयार है। सरकार ने कहा कि एकतरफा अतिरिक्त शुल्क लगाने के बजाय द्विपक्षीय व्यापार वार्ता को प्राथमिकता देना दोनों देशों के हित में होगा।भारत का मानना है कि सहयोग की भावना से लिए गए निर्णय न केवल दोनों देशों की अर्थव्यवस्था को मजबूत करेंगे बल्कि वैश्विक व्यापार व्यवस्था को भी अधिक स्थिर और संतुलित बनाएंगे।