1 लाख लगाया, अब 8 लाख की कमाई!
छत्तीसगढ़ की दिलमती ने स्वयं सहायता समूह से एक लाख रुपये का ऋण लेकर सूअर पालन शुरू किया। आज वह हर वर्ष सात से आठ लाख रुपये की आय अर्जित कर रही हैं और ग्रामीण महिलाओं के लिए प्रेरणा बन गई हैं।
दि राइजिंग न्यूज़ | छत्तीसगढ़ | 19 जुलाई 2026
छत्तीसगढ़ के बलरामपुर जिले के लडुवा गांव की रहने वाली दिलमती ने मेहनत, धैर्य और सही योजना के दम पर अपनी आर्थिक स्थिति पूरी तरह बदल दी। कभी केवल पारंपरिक खेती पर निर्भर रहने वाला उनका परिवार सीमित आय के कारण आर्थिक परेशानियों का सामना करता था। लेकिन स्वयं सहायता समूह से जुड़ने और स्वरोजगार का रास्ता अपनाने के बाद उनकी जिंदगी ने नई दिशा पकड़ ली। आज दिलमती हर वर्ष सात से आठ लाख रुपये तक की आय अर्जित कर रही हैं और इलाके में सफल "लखपति दीदी" के रूप में पहचानी जाती हैं।दिलमती की सफलता केवल उनके परिवार तक सीमित नहीं रही, बल्कि अब उनके गांव और आसपास के क्षेत्रों की कई महिलाएं भी उनसे प्रेरणा लेकर स्वरोजगार की ओर कदम बढ़ा रही हैं। उनकी कहानी यह साबित करती है कि सीमित संसाधनों के बावजूद सही निर्णय और लगातार मेहनत से आर्थिक आत्मनिर्भरता हासिल की जा सकती है।
कैसे शुरू हुआ स्वरोजगार
दिलमती "मां दुर्गा महिला स्वयं सहायता समूह" से जुड़ी हुई हैं। पहले उनका पूरा परिवार केवल खेती पर निर्भर था, लेकिन खेती से होने वाली आय परिवार की जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं थी। आर्थिक कठिनाइयों के कारण परिवार के सामने रोजमर्रा के खर्च चलाना भी चुनौती बन गया था।स्वयं सहायता समूह से जुड़ने के बाद उन्हें एक लाख रुपये का ऋण मिला। इस राशि से उन्होंने झारखंड से दस सूअर खरीदकर छोटे स्तर पर सूअर पालन का काम शुरू किया। शुरुआत भले ही छोटी थी, लेकिन उन्होंने धैर्य के साथ अपने व्यवसाय को आगे बढ़ाया और धीरे-धीरे इसे लाभदायक बना दिया।
छोटे कारोबार से बनी बड़ी सफलता
शुरुआत के कुछ समय बाद दिलमती का व्यवसाय तेजी से बढ़ने लगा। उनके पास मौजूद मादा सूअर एक बार में नौ से दस बच्चों को जन्म देने लगीं। प्रत्येक बच्चे की अच्छी कीमत मिलने से उनकी आय लगातार बढ़ती गई और कारोबार मजबूत होता गया।समय के साथ उन्होंने अपने व्यवसाय का विस्तार किया और पशुपालन को नियमित आय का मजबूत माध्यम बना लिया। आज उनका यह उद्यम पूरे परिवार की आर्थिक स्थिति सुधारने का सबसे बड़ा आधार बन चुका है और उन्हें हर वर्ष सात से आठ लाख रुपये तक की आय प्राप्त हो रही है।
कमाई को फिर से निवेश कर बढ़ाया कारोबार
दिलमती ने केवल कमाई करने तक खुद को सीमित नहीं रखा, बल्कि आय का बड़ा हिस्सा दोबारा अपने व्यवसाय और खेती में लगाया। उन्होंने पशुओं के लिए बेहतर शेड का निर्माण कराया, खेती के आधुनिक उपकरण खरीदे और सिंचाई की बेहतर व्यवस्था विकसित की।इसके साथ ही उन्होंने जैविक सब्जियों की खेती भी शुरू कर दी। इससे उनकी आय के कई स्रोत तैयार हो गए और परिवार की आर्थिक स्थिति पहले की तुलना में कहीं अधिक मजबूत हो गई। यही सोच उन्हें एक सफल ग्रामीण उद्यमी के रूप में स्थापित करती है।
गांव की महिलाओं के लिए बनीं प्रेरणा
दिलमती की सफलता का असर पूरे गांव में दिखाई देने लगा है। उनकी उपलब्धियों को देखकर गांव के लगभग दस से पंद्रह परिवारों ने भी सूअर पालन का व्यवसाय शुरू किया है। इससे गांव में स्वरोजगार को बढ़ावा मिला है और लोगों की आय में भी वृद्धि हो रही है।दिलमती अब अन्य महिलाओं को स्वयं सहायता समूह से जुड़ने, नियमित बचत करने और ऋण का उपयोग केवल आय बढ़ाने वाले कार्यों में करने की सलाह देती हैं। उनका मानना है कि यदि महिलाएं आत्मनिर्भर बनेंगी तो पूरे परिवार और समाज की आर्थिक स्थिति मजबूत होगी।
स्वयं सहायता समूह बना आर्थिक बदलाव का आधार
ग्रामीण क्षेत्रों में स्वयं सहायता समूह महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने का महत्वपूर्ण माध्यम बन रहे हैं। छोटे ऋण की सहायता से महिलाएं पशुपालन, खेती और अन्य छोटे व्यवसाय शुरू कर अपनी आय बढ़ा रही हैं।दिलमती की कहानी इस बात का उदाहरण है कि यदि सरकारी योजनाओं और समूह आधारित वित्तीय सहायता का सही उपयोग किया जाए तो ग्रामीण महिलाएं भी सफल उद्यमी बन सकती हैं और अपने साथ-साथ पूरे गांव के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।
महत्वपूर्ण बिंदु
- छत्तीसगढ़ के बलरामपुर जिले के लडुवा गांव की रहने वाली हैं दिलमती।
- स्वयं सहायता समूह से एक लाख रुपये का ऋण लेकर शुरू किया सूअर पालन।
- आज हर वर्ष सात से आठ लाख रुपये तक की आय अर्जित कर रही हैं।
- व्यवसाय से हुई कमाई को खेती और पशुपालन में दोबारा निवेश किया।
- जैविक खेती और आधुनिक सिंचाई व्यवस्था भी शुरू की।
- उनकी सफलता से प्रेरित होकर गांव के कई परिवारों ने भी स्वरोजगार अपनाया।
- अब अन्य महिलाओं को आत्मनिर्भर बनने के लिए प्रेरित कर रही हैं।