विकास की दौड़ में कराहता पर्यावरण, हिमालय से महानगरों तक बढ़ा संकट

भारत में तेज विकास और बड़े बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के बीच पर्यावरणीय चुनौतियां लगातार बढ़ रही हैं। हिमालयी क्षेत्रों में निर्माण कार्य, नदियों पर बढ़ता दबाव, महानगरों में जल संकट और प्रदूषण जैसी समस्याएं संतुलित विकास मॉडल की आवश्यकता को रेखांकित करती हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि पर्यावरण संरक्षण के बिना विकास टिकाऊ नहीं हो सकता।

विकास की दौड़ में कराहता पर्यावरण, हिमालय से महानगरों तक बढ़ा संकट

दि राइजिंग न्यूज़। नई दिल्ली। 05 जून 2026

विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर जहां देशभर में पर्यावरण संरक्षण के दावे और संकल्प दोहराए जा रहे हैं, वहीं जमीनी हकीकत कई गंभीर सवाल खड़े कर रही है। बीते एक दशक में भारत ने सड़क, एक्सप्रेसवे, सुरंग, बांध और शहरी विकास के क्षेत्र में अभूतपूर्व प्रगति दर्ज की है, लेकिन इस विकास की कीमत पर्यावरण को चुकानी पड़ रही है।  यदि विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन नहीं बनाया गया तो आने वाले वर्षों में देश को बड़े पर्यावरणीय और मानवीय संकटों का सामना करना पड़ सकता है।

हिमालयी क्षेत्रों पर बढ़ता दबाव

उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और पूर्वोत्तर भारत के संवेदनशील पर्वतीय क्षेत्रों में तेजी से हो रहे निर्माण कार्यों ने पर्यावरणीय संतुलन को प्रभावित किया है। पहाड़ों को काटकर चौड़ी सड़कें, सुरंगें और बड़े निर्माण कार्य किए जा रहे हैं, जिससे भूस्खलन, भूधंसाव और प्राकृतिक आपदाओं का खतरा बढ़ गया है।  पर्वतीय क्षेत्रों में वैज्ञानिक मानकों की अनदेखी कर किए गए निर्माण कार्यों ने पहाड़ों की प्राकृतिक मजबूती को कमजोर किया है। यही कारण है कि अब मामूली बारिश में भी कई इलाकों में भूस्खलन और सड़क धंसने की घटनाएं लगातार सामने आ रही हैं।

चारधाम परियोजना पर उठे सवाल

उत्तराखंड में चारधाम मार्ग परियोजना को देश की सबसे महत्वाकांक्षी बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में गिना जाता है। इस योजना का उद्देश्य बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री को हर मौसम में बेहतर सड़क संपर्क प्रदान करना है। हालांकि पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि परियोजना के दौरान बड़ी संख्या में पेड़ों की कटाई हुई और पहाड़ों को कई स्थानों पर सीधे काटा गया, जिससे प्राकृतिक ढलानों को नुकसान पहुंचा। इससे भूस्खलन की घटनाओं में वृद्धि हुई है और कई जल स्रोत भी प्रभावित हुए हैं।

नदियों पर बढ़ता खतरा

सुरंग निर्माण और सड़क चौड़ीकरण के दौरान निकले मलबे को कई स्थानों पर नदियों और जलधाराओं में डाले जाने के आरोप भी सामने आए हैं। इससे नदियों की जलधारण क्षमता प्रभावित हुई है और बाढ़ जैसी स्थितियां अधिक खतरनाक बनती जा रही हैं। यदि नदी तंत्र के साथ इसी प्रकार छेड़छाड़ जारी रही तो भविष्य में जल संकट और बाढ़ दोनों की गंभीरता बढ़ सकती है।

शहरों में भी बिगड़ता पर्यावरण संतुलन

पर्यावरणीय संकट केवल पहाड़ों तक सीमित नहीं है। दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु, चेन्नई समेत देश के कई बड़े शहरों में झीलों, तालाबों और आर्द्रभूमियों पर अतिक्रमण बढ़ा है। इसके परिणामस्वरूप बेंगलुरु जैसे शहरों में जल संकट गहराता जा रहा है, जबकि मुंबई और चेन्नई में थोड़ी सी बारिश भी जलभराव और बाढ़ जैसी स्थिति पैदा कर देती है। इसके अलावा देश के कई प्रमुख शहर लगातार वायु प्रदूषण की गंभीर समस्या से जूझ रहे हैं।

पर्यावरणीय मंजूरियों पर भी सवाल

 कई परियोजनाओं को शीघ्र मंजूरी देने के लिए पर्यावरणीय प्रभाव मूल्यांकन प्रक्रिया को कमजोर किया गया है। स्थानीय समुदायों और पर्यावरण विशेषज्ञों की आपत्तियों को पर्याप्त महत्व नहीं दिया जाता, जिससे दीर्घकालिक पर्यावरणीय नुकसान का खतरा बढ़ जाता है।

क्या है समाधान

पर्यावरणविदों का मानना है कि विकास को पूरी तरह रोकना समाधान नहीं है, बल्कि विकास को पर्यावरण के अनुकूल बनाना आवश्यक है। इसके लिए प्रत्येक बड़ी परियोजना की पर्यावरणीय लागत का गंभीर मूल्यांकन किया जाना चाहिए। पर्वतीय क्षेत्रों में सीमित निर्माण, कम चौड़ाई वाली सुरक्षित सड़कें, रोपवे जैसी तकनीकों का उपयोग और पर्यटकों की संख्या पर वैज्ञानिक नियंत्रण जैसे उपाय अपनाए जा सकते हैं। साथ ही पर्यावरण संरक्षण कानूनों का सख्ती से पालन भी सुनिश्चित करना होगा।

भविष्य के लिए चेतावनी

 प्रकृति के साथ संतुलन बनाए बिना किया गया विकास लंबे समय तक टिकाऊ नहीं हो सकता। जलवायु परिवर्तन, बढ़ती प्राकृतिक आपदाएं, जल संकट और प्रदूषण पहले ही चेतावनी दे चुके हैं कि पर्यावरण संरक्षण अब केवल विकल्प नहीं बल्कि आवश्यकता बन चुका है। विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर सबसे बड़ा संदेश यही है कि आर्थिक विकास और पर्यावरण संरक्षण को एक-दूसरे का विरोधी नहीं बल्कि पूरक माना जाए। यदि समय रहते संतुलित नीतियां नहीं अपनाई गईं, तो आने वाली पीढ़ियों को इसका भारी खामियाजा भुगतना पड़ सकता है।