किसानों के दिल्ली कूच से बढ़ी हलचल!

भारत-अमेरिका प्रस्तावित व्यापार समझौते के विरोध में किसानों का दिल्ली कूच और महापंचायत राष्ट्रीय राजनीति का बड़ा मुद्दा बन गया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि आंदोलन लंबा चला, तो इसका असर आगामी पंजाब विधानसभा चुनाव पर भी पड़ सकता है।

किसानों के दिल्ली कूच से बढ़ी हलचल!

दि राइजिंग न्यूज़ | नई दिल्ली | 21 जुलाई 2026

भारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित व्यापार समझौते को लेकर देशभर में किसान संगठनों का विरोध तेज हो गया है। राजधानी दिल्ली में आयोजित किसान महापंचायत और किसानों के दिल्ली कूच ने इस मुद्दे को केवल कृषि तक सीमित नहीं रहने दिया, बल्कि यह अब राजनीतिक बहस का भी प्रमुख विषय बन गया है। पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और अन्य राज्यों से बड़ी संख्या में किसानों का राजधानी पहुंचने का प्रयास इस बात का संकेत माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में यह आंदोलन और बड़ा रूप ले सकता है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि यह आंदोलन लंबा चला तो इसका सीधा असर वर्ष २०२७ के पंजाब विधानसभा चुनाव पर दिखाई दे सकता है।वर्ष २०२२ के विधानसभा चुनाव से पहले भी तीन कृषि कानूनों के विरोध में किसानों का आंदोलन राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में आ गया था। उस समय लगभग एक वर्ष तक चले आंदोलन के बाद केंद्र सरकार को तीनों कृषि कानून वापस लेने पड़े थे। हालांकि कानून वापस लेने के बावजूद भारतीय जनता पार्टी को पंजाब विधानसभा चुनाव में अपेक्षित सफलता नहीं मिली थी। अब एक बार फिर किसानों का बड़ा आंदोलन शुरू होने से राजनीतिक दलों ने अपनी रणनीति बनानी शुरू कर दी है।

भारत-अमेरिका व्यापार समझौते के विरोध में किसानों की महापंचायत

देश बचाओ मोर्चा के नेतृत्व में दिल्ली के किसान घाट पर एक दिवसीय किसान महापंचायत आयोजित की गई। इस महापंचायत में पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और अन्य राज्यों से हजारों किसान शामिल होने पहुंचे। किसान संगठनों का आरोप है कि प्रस्तावित व्यापार समझौते के लागू होने से देश के कृषि क्षेत्र को भारी नुकसान होगा और विदेशी कृषि उत्पादों के कारण भारतीय किसानों की आय प्रभावित होगी।किसानों का कहना है कि यदि सरकार ने समय रहते उनकी आशंकाओं को दूर नहीं किया तो यह आंदोलन पूरे देश में फैल सकता है। किसान नेताओं ने स्पष्ट किया कि यह केवल एक दिन का विरोध प्रदर्शन नहीं है, बल्कि किसानों के अधिकारों और कृषि व्यवस्था को सुरक्षित रखने की दिशा में एक बड़े जनआंदोलन की शुरुआत है। उनका कहना है कि सरकार को बातचीत के माध्यम से समाधान निकालना चाहिए।

शंभू सीमा पर किसानों को रोका गया, कई घंटे तक बना रहा तनाव

दिल्ली की ओर बढ़ रहे किसानों को हरियाणा सरकार ने शंभू सीमा पर रोक दिया। सीमा पर बड़ी संख्या में पुलिस बल, अर्धसैनिक बल और सुरक्षा कर्मियों की तैनाती की गई थी। प्रशासन ने बैरिकेडिंग कर किसानों के वाहनों को आगे बढ़ने से रोक दिया, जिसके कारण सीमा पर कई किलोमीटर लंबा जाम लग गया और हजारों किसान वहीं रुक गए।सीमा पर मौजूद किसानों का कहना था कि वे पूरी तरह शांतिपूर्ण तरीके से दिल्ली जाकर अपनी बात सरकार तक पहुंचाना चाहते हैं। किसानों ने आरोप लगाया कि उन्हें बिना किसी उचित कारण के रोका जा रहा है। कई किसान घंटों तक तेज धूप में बैठे रहे और प्रशासन से रास्ता खोलने की मांग करते रहे। इस दौरान माहौल तनावपूर्ण बना रहा, हालांकि किसी बड़े टकराव की सूचना सामने नहीं आई।

किसान नेताओं ने सरकार पर लगाए गंभीर आरोप

किसान नेता सरवन सिंह पंढेर ने कहा कि किसानों को लोकतांत्रिक तरीके से अपनी बात रखने का अधिकार है, लेकिन सरकार उन्हें दिल्ली पहुंचने से रोक रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार किसानों की आवाज दबाने का प्रयास कर रही है और उनकी मांगों को गंभीरता से नहीं ले रही। उन्होंने कहा कि यदि किसानों को रोका गया तो आंदोलन और व्यापक होगा।इससे पहले भारतीय किसान यूनियन के नेता गुरनाम सिंह चढ़ूनी को भी पुलिस ने उस समय हिरासत में ले लिया था, जब वह दिल्ली में आयोजित महापंचायत में शामिल होने के लिए जा रहे थे। किसान संगठनों ने इसे लोकतांत्रिक अधिकारों का उल्लंघन बताते हुए सरकार की कार्रवाई की आलोचना की। उनका कहना है कि किसानों को डराकर आंदोलन समाप्त नहीं कराया जा सकता।

वर्ष २०२२ के आंदोलन ने बदल दी थी पंजाब की राजनीति

वर्ष २०२२ के विधानसभा चुनाव से पहले तीन कृषि कानूनों के विरोध में किसानों का आंदोलन लगभग एक वर्ष तक चला था। इस आंदोलन ने केवल केंद्र सरकार पर दबाव नहीं बनाया, बल्कि पंजाब की राजनीति की दिशा भी बदल दी। लंबे विरोध प्रदर्शन के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्र के नाम संदेश में तीनों कृषि कानून वापस लेने की घोषणा की थी।हालांकि कानून वापस लेने के बावजूद भारतीय जनता पार्टी को पंजाब विधानसभा चुनाव में केवल दो सीटें ही मिल सकीं। वहीं वर्षों पुराना भारतीय जनता पार्टी और शिरोमणि अकाली दल का गठबंधन भी टूट गया। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि किसान आंदोलन से बने माहौल का सबसे अधिक लाभ आम आदमी पार्टी को मिला, जिसने पहली बार पंजाब में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई।

लोकसभा चुनाव में भी नहीं खुला भारतीय जनता पार्टी का खाता

विधानसभा चुनाव के बाद हुए लोकसभा चुनाव में भी भारतीय जनता पार्टी पंजाब में कोई सीट जीतने में सफल नहीं हो सकी। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि किसान आंदोलन के कारण ग्रामीण क्षेत्रों में पार्टी के प्रति नाराजगी बनी रही, जिसका असर चुनाव परिणामों में साफ दिखाई दिया।अब यदि वर्तमान आंदोलन आने वाले महीनों में और मजबूत होता है, तो इसका प्रभाव आगामी विधानसभा चुनावों पर भी पड़ सकता है। राजनीतिक दल फिलहाल खुलकर कोई बड़ा दांव नहीं खेल रहे हैं, लेकिन सभी दल किसानों के रुख और आंदोलन की दिशा पर लगातार नजर बनाए हुए हैं।

कांग्रेस ने सरकार को घेरा

कांग्रेस सांसद सुखदेव भगत ने कहा कि भारत एक कृषि प्रधान देश है और किसानों की समस्याओं की अनदेखी नहीं की जा सकती। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार की नीतियां किसानों के हितों के अनुकूल नहीं हैं और व्यापार समझौते के कारण किसानों को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ सकता है। उन्होंने कहा कि पहले भी किसानों के लंबे संघर्ष के बाद सरकार को अपने फैसले वापस लेने पड़े थे।कांग्रेस का कहना है कि सरकार को किसानों के साथ टकराव का रास्ता छोड़कर बातचीत करनी चाहिए। पार्टी ने मांग की कि प्रस्तावित व्यापार समझौते के सभी पहलुओं को किसानों के सामने रखा जाए और उनकी सहमति के बाद ही कोई अंतिम निर्णय लिया जाए।

आम आदमी पार्टी ने भी दिया समर्थन

आम आदमी पार्टी के सांसद मालविंदर सिंह कांग ने कहा कि प्रस्तावित व्यापार समझौते का सबसे अधिक असर देश के किसानों पर पड़ेगा। उन्होंने दावा किया कि यदि यह समझौता लागू हुआ तो कृषि क्षेत्र को भारी नुकसान होगा और छोटे किसानों के सामने आर्थिक संकट खड़ा हो सकता है।उन्होंने कहा कि यह आंदोलन केवल पंजाब का नहीं बल्कि पूरे देश के किसानों का आंदोलन बन सकता है। उनका मानना है कि सरकार को किसानों की चिंताओं को गंभीरता से सुनना चाहिए और ऐसा कोई निर्णय नहीं लेना चाहिए जिससे कृषि क्षेत्र और किसानों की आजीविका प्रभावित हो। आने वाले दिनों में आंदोलन किस दिशा में जाएगा, इस पर पूरे देश की नजर बनी हुई है।