जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा का बड़ा फैसला: एक केस से अलग हुईं, दूसरे में नहीं हटने का लिया निर्णय

दिल्ली उच्च न्यायालय की जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा एक बार फिर चर्चा में हैं। उन्होंने अरविंद केजरीवाल से जुड़े एक मामले में स्वयं को अलग करने से इनकार किया था, जबकि कार्ति चिदंबरम से जुड़े एक अन्य केस से उन्होंने खुद को अलग कर लिया। इस फैसले ने न्यायिक हलकों में नई बहस को जन्म दिया है।

जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा का बड़ा फैसला: एक केस से अलग हुईं, दूसरे में नहीं हटने का लिया निर्णय

दि राइजिंग न्यूज़ डेस्क | 28 अप्रैल 2026


मामला क्या है

दिल्ली उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति स्वर्णकांता शर्मा ने एक बार फिर सुर्खियां बटोरी हैं। उन्होंने पहले अरविंद केजरीवाल के शराब नीति मामले से खुद को अलग करने से इनकार किया था, लेकिन अब उन्होंने कांग्रेस सांसद कार्ति चिदंबरम से जुड़े एक अलग मामले की सुनवाई से स्वयं को अलग कर लिया है। इस बदलाव ने न्यायिक हलकों में नई चर्चा को जन्म दिया है और उनके इस निर्णय को लेकर विभिन्न स्तरों पर विचार-विमर्श शुरू हो गया है।


किस केस से अलग हुईं जस्टिस

यह मामला डियाजियो स्कॉटलैंड से जुड़े कथित घोटाले में केंद्रीय जांच एजेंसी द्वारा दर्ज केस से संबंधित है। कांग्रेस सांसद कार्ति चिदंबरम ने इस केस को रद्द करने की मांग की थी। इस याचिका की सुनवाई जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा की अदालत में होनी थी, लेकिन उन्होंने खुद को इस सुनवाई से अलग कर दिया और मामला मुख्य न्यायाधीश को भेज दिया गया, ताकि आगे की सुनवाई के लिए नई पीठ का गठन किया जा सके।


केजरीवाल केस में पहले का रुख

अरविंद केजरीवाल ने भी इसी न्यायाधीश से मामले को अलग करने की मांग की थी। हालांकि जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ने उस समय स्पष्ट रूप से सुनवाई जारी रखने का निर्णय लिया था। उन्होंने कहा था कि केवल किसी पक्ष की आशंका के आधार पर न्यायाधीश को हटाया नहीं जा सकता। उन्होंने संस्थागत गरिमा और न्यायिक निष्पक्षता को सर्वोपरि बताया था और यह भी स्पष्ट किया था कि न्यायिक प्रक्रिया में निष्पक्षता बनाए रखना अत्यंत आवश्यक है।


केजरीवाल की प्रतिक्रिया

अरविंद केजरीवाल ने न्यायाधीश को पत्र लिखकर अपने असंतोष को व्यक्त किया था। उन्होंने कहा कि अब उन्हें इस अदालत से निष्पक्ष न्याय की उम्मीद नहीं है। उन्होंने अदालत में पेश न होने और कानूनी लड़ाई के बजाय वैचारिक विरोध की बात कही थी। साथ ही उन्होंने अपने कानूनी अधिकार सुरक्षित रखने की बात भी स्पष्ट की थी, जिससे यह मामला और अधिक चर्चा में आ गया था।


न्यायिक व्यवस्था पर टिप्पण

अदालत ने अपने पूर्व आदेश में कहा था कि न्यायाधीश की निष्पक्षता को तब तक माना जाता है जब तक इसका ठोस खंडन न हो। केवल किसी पक्ष की व्यक्तिगत धारणा या आशंका के आधार पर जज को हटाया नहीं जा सकता। न्यायिक प्रक्रिया में संस्थागत शुचिता को बनाए रखना अत्यंत आवश्यक है। यह निर्णय न्याय व्यवस्था की पारदर्शिता को दर्शाता है और यह स्पष्ट करता है कि न्यायिक निर्णय केवल तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर ही लिए जाते हैं।


जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा का यह नया निर्णय न्यायिक हलकों में चर्चा का विषय बन गया है। एक ओर उन्होंने एक मामले से स्वयं को अलग किया, जबकि दूसरे में उन्होंने ऐसा नहीं किया था। इससे न्यायिक प्रक्रिया की संवेदनशीलता और जटिलता दोनों सामने आई हैं। द राइजिंग न्यूज़ का मानना है कि ऐसे मामले न्याय व्यवस्था की पारदर्शिता पर व्यापक बहस को जन्म देते हैं, जिससे न्यायिक प्रक्रियाओं को लेकर लोगों की समझ और जागरूकता और अधिक बढ़ती है।