रिजर्व बैंक ने सरकार को दिए 2.87 लाख करोड़, बढ़ी आर्थिक हलचल...

भारतीय रिजर्व बैंक ने केंद्र सरकार को 2.87 लाख करोड़ रुपये का रिकॉर्ड डिविडेंड देने का ऐलान किया है। रुपये की कमजोरी, विदेशी निवेश से बढ़ी आय और वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों के बीच आरबीआई की यह कमाई चर्चा का विषय बन गई है। इस फैसले से सरकार को राजकोषीय घाटा नियंत्रित करने और आर्थिक योजनाओं को मजबूती देने में मदद मिलेगी।

रिजर्व बैंक ने सरकार को दिए 2.87 लाख करोड़, बढ़ी आर्थिक हलचल...

दि राइजिंग न्यूज़ | नई दिल्ली | 26 मई 2026

भारतीय रिजर्व बैंक ने केंद्र सरकार को वित्त वर्ष 2025-26 के लिए 2.87 लाख करोड़ रुपये का रिकॉर्ड सरप्लस ट्रांसफर करने का फैसला लिया है। यह भारतीय रिजर्व बैंक के 90 साल के इतिहास का सबसे बड़ा डिविडेंड माना जा रहा है। इस फैसले के बाद देश में आर्थिक और राजनीतिक बहस तेज हो गई है। कई विशेषज्ञ इसे सरकार के लिए बड़ी राहत बता रहे हैं, जबकि कुछ अर्थशास्त्री इसे केंद्रीय बैंक की बढ़ती वित्तीय निर्भरता के तौर पर देख रहे हैं। ऐसे समय में जब वैश्विक हालात अस्थिर हैं और पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ा हुआ है, तब आरबीआई का यह कदम केंद्र सरकार के लिए किसी बड़े सहारे से कम नहीं माना जा रहा।

 क्या होता है आरबीआई का डिविडेंड

भारतीय रिजर्व बैंक केवल नोट छापने वाली संस्था नहीं है, बल्कि यह देश की पूरी बैंकिंग व्यवस्था और मौद्रिक नीति को नियंत्रित करने वाला केंद्रीय बैंक है। आरबीआई अपने विभिन्न वित्तीय कामकाज से हर साल बड़ी कमाई करता है। कानून के अनुसार, आरबीआई अपने मुनाफे का एक बड़ा हिस्सा केंद्र सरकार को देता है, जिसे सरप्लस ट्रांसफर या डिविडेंड कहा जाता है। इस बार आरबीआई के केंद्रीय निदेशक मंडल की बैठक में 2,86,588.46 करोड़ रुपये सरकार को देने की मंजूरी दी गई। यह रकम कई राज्यों के वार्षिक बजट से भी ज्यादा बताई जा रही है, जिससे इसकी गंभीरता और महत्व का अंदाजा लगाया जा सकता है।

 आखिर आरबीआई को इतनी बड़ी कमाई कैसे हुई

इस रिकॉर्ड कमाई के पीछे सबसे बड़ा कारण रुपये की कमजोरी को माना जा रहा है। वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान डॉलर के मुकाबले रुपया करीब 10 प्रतिशत तक कमजोर हुआ। जब रुपया गिरता है, तब आरबीआई के पास मौजूद विदेशी मुद्रा भंडार की कीमत रुपये में बढ़ जाती है। भारत के पास करीब 600 अरब डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार है और उसकी बढ़ी हुई कीमत ने आरबीआई के मुनाफे में जबरदस्त इजाफा किया। इसके अलावा विदेशी निवेशों से मिलने वाला ब्याज, सरकारी बॉन्ड पर आय और मुद्रा छपाई से मिलने वाली फीस ने भी आरबीआई की कमाई को रिकॉर्ड स्तर तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई।

पश्चिम एशिया संकट ने कैसे बढ़ाया आरबीआई का फायदा

पश्चिम एशिया में बढ़ते युद्ध जैसे हालात और ईरान-अमेरिका तनाव का असर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर पड़ा है। कच्चे तेल की कीमतों में उछाल आने से भारत का आयात बिल बढ़ा और रुपये पर दबाव बना। आमतौर पर कमजोर रुपया देश के लिए चिंता का विषय माना जाता है, लेकिन इस बार यही कमजोरी आरबीआई के लिए मुनाफे का बड़ा जरिया बन गई। विदेशी मुद्रा संपत्तियों का मूल्य बढ़ने से केंद्रीय बैंक की बैलेंस शीट मजबूत हुई और सरकार को रिकॉर्ड डिविडेंड देना संभव हो पाया। विशेषज्ञ मानते हैं कि अंतरराष्ट्रीय संकटों के बीच आरबीआई ने अपनी वित्तीय स्थिति को मजबूती से संभाला।

सरकार इस पैसे का इस्तेमाल कहां करेगी

केंद्र सरकार के सामने इस समय कई आर्थिक चुनौतियां हैं। पश्चिम एशिया संकट के कारण तेल और उर्वरक सब्सिडी का बोझ लगातार बढ़ रहा है। ऐसे में आरबीआई से मिली यह बड़ी रकम सरकार को वित्तीय राहत दे सकती है। माना जा रहा है कि सरकार इस राशि का इस्तेमाल राजकोषीय घाटा नियंत्रित करने, कल्याणकारी योजनाओं को जारी रखने और बाजार से कम कर्ज लेने में करेगी। अगर सरकार को कम कर्ज लेना पड़ेगा तो ब्याज दरों पर दबाव कम रहेगा और आम लोगों की ऋण संबंधी लागत भी नियंत्रित रह सकती है। यही वजह है कि इस फैसले को आम जनता से भी जोड़कर देखा जा रहा है।

 आपकी जेब पर क्या पड़ेगा असर

आरबीआई का यह डिविडेंड सीधे तौर पर जनता के खातों में नहीं आएगा, लेकिन इसका अप्रत्यक्ष असर हर नागरिक पर पड़ सकता है। सरकार के पास अतिरिक्त पैसा आने से नए टैक्स लगाने की जरूरत कम हो सकती है। इसके अलावा यदि सरकार का वित्तीय घाटा नियंत्रित रहता है तो महंगाई और ब्याज दरों पर भी कुछ हद तक नियंत्रण संभव है। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे गृह ऋण, वाहन ऋण और अन्य कर्ज की ब्याज दरों में स्थिरता बनी रह सकती है। हालांकि अगर बाजार में जरूरत से ज्यादा नकदी पहुंचती है तो महंगाई बढ़ने का खतरा भी बना रहेगा।

क्या आरबीआई सरकार का ‘खामोश फाइनेंसर’ बनता जा रहा है

पिछले कुछ वर्षों में आरबीआई द्वारा सरकार को दिए जाने वाले डिविडेंड में लगातार भारी बढ़ोतरी देखने को मिली है। वित्त वर्ष 2022 में जहां यह रकम करीब 30 हजार करोड़ रुपये थी, वहीं अब यह बढ़कर 2.87 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गई है। इसी वजह से कई अर्थशास्त्री सवाल उठा रहे हैं कि क्या केंद्रीय बैंक धीरे-धीरे सरकार के लिए स्थायी वित्तीय सहारा बनता जा रहा है। कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि आरबीआई को इतना बड़ा लाभांश देने के बजाय अपने जोखिम कोष को और मजबूत करना चाहिए, ताकि भविष्य के किसी बड़े आर्थिक संकट का सामना बेहतर तरीके से किया जा सके।

देश की अर्थव्यवस्था के लिए कितना अहम है यह फैसला

विशेषज्ञों के मुताबिक आरबीआई का यह फैसला ऐसे समय में आया है जब वैश्विक अर्थव्यवस्था कई संकटों से गुजर रही है। अमेरिका और पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव, कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और वैश्विक बाजार की अनिश्चितता के बीच भारत सरकार के लिए यह रकम किसी बड़ी राहत से कम नहीं मानी जा रही। इससे सरकार को विकास योजनाओं, सब्सिडी और आर्थिक संतुलन बनाए रखने में मदद मिल सकती है। हालांकि आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि सरकार इस रिकॉर्ड राशि का इस्तेमाल किस रणनीति के तहत करती है और इसका देश की आम जनता पर कितना सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।