लोकसभा की 543 सीटों में तुरंत लागू क्यों नहीं हो सकता कानून, सरकार और विपक्ष आमने-सामने
महिला आरक्षण कानून लागू होने के बावजूद लोकसभा की मौजूदा 543 सीटों पर इसे तुरंत लागू नहीं किया जा सकता। सरकार और विपक्ष के बीच परिसीमन, जनगणना और ओबीसी आरक्षण को लेकर बड़ा राजनीतिक विवाद जारी है।
दि राइजिंग न्यूज़ डेस्क | 18 अप्रैल 2026
भारत की संसद में महिला आरक्षण को लेकर एक बड़ा राजनीतिक और संवैधानिक विवाद सामने आया है। हाल ही में संविधान संशोधन विधेयक के लोकसभा में पारित न हो पाने के बाद यह सवाल और गहरा हो गया है कि जब महिला आरक्षण कानून पहले से मौजूद है, तो इसे मौजूदा 543 सीटों वाली लोकसभा में तुरंत लागू क्यों नहीं किया जा सकता।
सरकार का प्रस्ताव और सीट बढ़ाने की योजना
सरकार का प्रस्ताव था कि पहले लोकसभा की सीटों को 543 से बढ़ाकर 816 किया जाए और भविष्य में इसे 850 तक ले जाया जाए। इन बढ़ी हुई सीटों में से एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करने की योजना थी। सरकार का मानना था कि इससे प्रतिनिधित्व में संतुलन आएगा और महिला भागीदारी बढ़ेगी।
विपक्ष का विरोध और परिसीमन पर सवाल
विपक्ष ने इस प्रस्ताव का कड़ा विरोध किया है। उनका कहना है कि 2011 की जनगणना के आधार पर परिसीमन करना सही नहीं है। उनका तर्क है कि पहले सामाजिक और क्षेत्रीय असमानताओं के मुद्दों को हल किया जाना चाहिए, उसके बाद ही सीटों में बदलाव होना चाहिए।
कानून के बावजूद लागू न होने की वजह
महिला आरक्षण कानून वर्ष 2023 में पारित हो चुका है और 2026 में अधिसूचित भी किया गया है। लेकिन इसमें यह शर्त शामिल है कि लागू करने से पहले नई जनगणना और परिसीमन जरूरी है। इसी कारण इसे तुरंत लागू नहीं किया जा सकता और इसमें समय लगना तय माना जा रहा है।
ओबीसी और जातिगत जनगणना का मुद्दा
इस विवाद में अन्य पिछड़ा वर्ग का मुद्दा भी अहम बन गया है। विपक्ष का कहना है कि जब तक जातिगत जनगणना पूरी नहीं होती, तब तक किसी बड़े संवैधानिक बदलाव पर फैसला नहीं होना चाहिए। इसी वजह से यह बहस और तेज हो गई है।
राजनीतिक टकराव और भविष्य की स्थिति
महिला आरक्षण को लेकर सरकार और विपक्ष के बीच टकराव लगातार बढ़ रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि जनगणना और परिसीमन के बिना कानून लागू होना मुश्किल है। यह मुद्दा आने वाले समय में भी राजनीति का केंद्र बना रहेगा।
महिला आरक्षण का वर्गवार प्रभाव
सामान्य वर्ग की महिलाओं के लिए आरक्षण
महिला आरक्षण के तहत सामान्य वर्ग की महिलाओं को भी एक-तिहाई सीटों में हिस्सा मिलेगा। इससे उनकी राजनीतिक भागीदारी बढ़ेगी और निर्णय लेने में उनकी भूमिका मजबूत होगी। यह कदम नेतृत्व में लैंगिक संतुलन बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
अनुसूचित जाति की महिलाओं के लिए आरक्षण
अनुसूचित जाति की आरक्षित सीटों में से 33 प्रतिशत सीटें महिलाओं के लिए निर्धारित की जाएंगी। इससे इस वर्ग की महिलाओं को राजनीति में आगे आने का अवसर मिलेगा। लंबे समय से कम प्रतिनिधित्व की समस्या को इससे दूर करने की कोशिश की जा रही है।
अनुसूचित जनजाति की महिलाओं के लिए आरक्षण
अनुसूचित जनजाति की सीटों में भी एक-तिहाई महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी। इससे जनजातीय क्षेत्रों की महिलाओं को अपनी आवाज उठाने का मौका मिलेगा। यह उनके सामाजिक और राजनीतिक सशक्तिकरण को बढ़ावा देगा।
ओबीसी को अलग आरक्षण न मिलने का कारण
राजनीतिक आरक्षण का अभाव
अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए संसद और विधानसभा में सीट आरक्षण का कोई संवैधानिक प्रावधान नहीं है। यही कारण है कि महिला आरक्षण में भी उन्हें अलग से शामिल नहीं किया गया है।
अलग कोटे की मांग और विवाद
ओबीसी महिलाओं के लिए अलग आरक्षण की मांग लगातार उठ रही है। कई दलों का कहना है कि बिना इसके महिला आरक्षण अधूरा है। यही वजह है कि यह मुद्दा अब भी राजनीतिक बहस का केंद्र बना हुआ है।
ओबीसी के लिए राजनीतिक आरक्षण का अभाव
अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए संसद और विधानसभा में सीट आरक्षण का कोई संवैधानिक प्रावधान नहीं है। जबकि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति को संविधान के तहत राजनीतिक आरक्षण मिला हुआ है। इसी वजह से ओबीसी का प्रतिनिधित्व सामान्य श्रेणी के भीतर ही माना जाता है। यह अंतर ही महिला आरक्षण में ओबीसी के अलग कोटे न होने की मुख्य वजह बनता है।
महिला आरक्षण का लागू होने का आधार
महिला आरक्षण उसी ढांचे पर लागू किया गया है, जहां पहले से सीट आरक्षण मौजूद है। यानी अनुसूचित जाति और जनजाति की सीटों में से एक-तिहाई महिलाओं को मिलेगा और सामान्य सीटों में भी यही नियम लागू होगा। इस व्यवस्था में ओबीसी के लिए अलग से सीटें निर्धारित नहीं हैं। इसलिए महिला आरक्षण में भी उनके लिए अलग प्रावधान नहीं जोड़ा गया।
ओबीसी महिलाओं के लिए अलग कोटे की मांग
ओबीसी महिलाओं को अलग आरक्षण न मिलने को लेकर राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर लगातार मांग उठ रही है। कई दलों और संगठनों का कहना है कि इससे प्रतिनिधित्व अधूरा रह जाता है। उनका मानना है कि समाज के बड़े हिस्से को बराबर भागीदारी देने के लिए ओबीसी महिलाओं को भी शामिल किया जाना चाहिए। यही कारण है कि यह मुद्दा आज भी बहस का प्रमुख विषय बना हुआ है।