मौलाना ने आसिम मुनीर को दी खुली चुनौती, बोले- 'वर्दी उतारो, फिर चुनाव लड़ो

जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम-फजल के प्रमुख मौलाना फजलुर रहमान ने पाकिस्तान सेना प्रमुख आसिम मुनीर को राजनीति में हस्तक्षेप को लेकर खुली चुनौती दी है। उन्होंने कहा कि यदि सेना राजनीति करना चाहती है तो वर्दी छोड़कर चुनाव लड़े। साथ ही बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा की बिगड़ती सुरक्षा स्थिति तथा नागरिकों से हथियारबंद संघर्ष में सहयोग मांगने की नीति पर भी उन्होंने कड़ा विरोध जताया।

मौलाना ने आसिम मुनीर को दी खुली चुनौती, बोले- 'वर्दी उतारो, फिर चुनाव लड़ो

दि राइजिंग न्यूज़ | पाकिस्तान | 13 जुलाई 2026

पाकिस्तान में सेना और राजनीति के संबंधों को लेकर एक बार फिर तीखी बहस छिड़ गई है। जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम-फजल के प्रमुख मौलाना फजलुर रहमान ने सेना प्रमुख आसिम मुनीर पर खुलकर निशाना साधते हुए कहा कि यदि सेना को राजनीति करनी है तो उसे संवैधानिक मर्यादा का पालन करते हुए वर्दी उतारकर जनता के बीच चुनाव लड़ना चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था में सेना का बढ़ता हस्तक्षेप राजनीतिक संस्थाओं को कमजोर कर रहा है। अपने संबोधन में उन्होंने बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा की बिगड़ती सुरक्षा स्थिति, नागरिकों से हथियार उठाने की अपील तथा शासन व्यवस्था की विफलताओं पर भी गंभीर प्रश्न खड़े किए।


पाकिस्तान में सेना की भूमिका पर खुलकर बोले मौलाना फजलुर रहमान

पंजाब प्रांत के कसूर में आयोजित एक विशाल जनसभा को संबोधित करते हुए जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम-फजल के प्रमुख मौलाना फजलुर रहमान ने पाकिस्तान की मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था और सेना की भूमिका पर खुलकर अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि किसी भी लोकतांत्रिक देश में संविधान सर्वोच्च होता है और उसी के अनुसार प्रत्येक संस्था की जिम्मेदारियां निर्धारित होती हैं। यदि कोई संस्था अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर कार्य करती है तो लोकतांत्रिक संतुलन प्रभावित होता है।मौलाना ने कहा कि संसद, न्यायपालिका, प्रशासन और सेना सभी की अपनी-अपनी संवैधानिक सीमाएं हैं। इन सीमाओं का सम्मान किए बिना देश में लोकतांत्रिक व्यवस्था मजबूत नहीं हो सकती। उन्होंने आरोप लगाया कि पाकिस्तान में लंबे समय से सेना का प्रभाव राजनीतिक निर्णयों पर दिखाई देता रहा है, जिससे निर्वाचित सरकारों की कार्यप्रणाली प्रभावित होती है।उन्होंने यह भी कहा कि जनता द्वारा चुनी गई सरकार ही देश चलाने का अधिकार रखती है। यदि किसी अन्य संस्था का हस्तक्षेप बढ़ता है तो इससे जनता के जनादेश का महत्व कम होता है और लोकतंत्र कमजोर पड़ता है। मौलाना ने सभी संस्थाओं से संविधान के अनुसार कार्य करने की अपील की।


'वर्दी उतारकर चुनाव लड़िए', आसिम मुनीर को दी खुली चुनौती

अपने भाषण के दौरान मौलाना फजलुर रहमान ने सेना प्रमुख आसिम मुनीर का नाम लेते हुए कहा कि यदि उन्हें राजनीति में रुचि है और वे शासन व्यवस्था को प्रभावित करना चाहते हैं तो उन्हें सबसे पहले सैन्य पद छोड़कर लोकतांत्रिक प्रक्रिया में शामिल होना चाहिए। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में सत्ता प्राप्त करने का एकमात्र वैध माध्यम जनता का मत होता है।मौलाना ने कहा कि चुनाव लड़ने के बाद ही यह पता चलेगा कि जनता वास्तव में किस पर विश्वास करती है। उन्होंने कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता ही अंतिम निर्णय करती है और किसी भी संस्था को पर्दे के पीछे रहकर राजनीतिक फैसलों को प्रभावित नहीं करना चाहिए। उन्होंने स्पष्ट किया कि लोकतंत्र में जनता का जनादेश सर्वोच्च होता है और उसी का सम्मान किया जाना चाहिए।उन्होंने यह भी कहा कि यदि सेना को लगता है कि उसके पास जनता का व्यापक समर्थन है तो उसे चुनावी मैदान में उतरने से पीछे नहीं हटना चाहिए। लोकतंत्र में जनता की अदालत सबसे बड़ी होती है और वही तय करती है कि शासन की जिम्मेदारी किसे मिलेगी।


बलूचिस्तान की बिगड़ती स्थिति को लेकर सरकार और सेना पर उठाए सवाल

मौलाना फजलुर रहमान ने अपने भाषण में बलूचिस्तान की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर गंभीर चिंता व्यक्त की। उन्होंने दावा किया कि प्रदेश के कई क्षेत्रों में सरकार और सुरक्षा एजेंसियों का प्रभाव पहले की तुलना में कमजोर हो गया है। उनके अनुसार लगातार बढ़ रही हिंसा और अशांति के कारण आम नागरिक भय के वातावरण में जीवन जीने को मजबूर हैं।उन्होंने कहा कि यदि किसी राज्य के नागरिक स्वयं को सुरक्षित महसूस नहीं करते तो यह शासन व्यवस्था की सबसे बड़ी विफलता मानी जाती है। मौलाना ने आरोप लगाया कि केवल सैन्य कार्रवाई से समस्या का स्थायी समाधान संभव नहीं है। इसके लिए स्थानीय लोगों का विश्वास जीतना, राजनीतिक संवाद स्थापित करना और विकास कार्यों को गति देना भी उतना ही आवश्यक है।उन्होंने यह भी कहा कि यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो स्थिति और अधिक जटिल हो सकती है। उनके अनुसार बलूचिस्तान में लंबे समय से चले आ रहे असंतोष को केवल बल प्रयोग से समाप्त नहीं किया जा सकता, बल्कि इसके लिए व्यापक राजनीतिक समाधान की आवश्यकता है।


खैबर पख्तूनख्वा में बढ़ती हिंसा पर जताई गहरी चिंता

मौलाना फजलुर रहमान ने कहा कि सुरक्षा संकट अब केवल बलूचिस्तान तक सीमित नहीं रहा है, बल्कि इसका प्रभाव खैबर पख्तूनख्वा में भी तेजी से दिखाई दे रहा है। उन्होंने दावा किया कि हाल के दिनों में हिंसक घटनाओं में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है और बड़ी संख्या में लोगों की जान गई है। इससे पूरे क्षेत्र में भय और असुरक्षा का वातावरण बन गया है।उन्होंने कहा कि लगातार बढ़ रही हिंसा से आम नागरिकों का जीवन प्रभावित हो रहा है। लोगों में भविष्य को लेकर चिंता बढ़ रही है और सामाजिक स्थिरता पर भी इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है। उनके अनुसार यदि सरकार समय रहते प्रभावी रणनीति नहीं अपनाती तो हालात और अधिक गंभीर हो सकते हैं।मौलाना ने सरकार से मांग की कि नागरिकों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाए। उन्होंने कहा कि कानून व्यवस्था बनाए रखना राज्य की जिम्मेदारी है और इसके लिए दीर्घकालिक तथा प्रभावी नीति अपनाई जानी चाहिए।


नागरिकों से हथियार उठाने की अपील का किया कड़ा विरोध

हाल ही में सेना प्रमुख आसिम मुनीर ने नागरिकों से आतंकवाद और प्रतिबंधित संगठनों के खिलाफ सेना का सहयोग करने की अपील की थी। इसी बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए मौलाना फजलुर रहमान ने कहा कि देश की रक्षा करना सेना और सुरक्षा एजेंसियों का संवैधानिक दायित्व है। आम नागरिकों को हथियारबंद संघर्ष का हिस्सा बनाने की अपील उचित नहीं कही जा सकती।उन्होंने कहा कि नागरिक करों के माध्यम से सरकार और सुरक्षा तंत्र का संचालन करते हैं। इसलिए सुरक्षा सुनिश्चित करना राज्य की जिम्मेदारी है। यदि नागरिकों को स्वयं हथियार उठाने के लिए प्रेरित किया जाएगा तो इससे समाज में अविश्वास, प्रतिशोध और हिंसा की भावना बढ़ सकती है।मौलाना ने चेतावनी दी कि ऐसी नीति आने वाली पीढ़ियों के लिए भी गंभीर सामाजिक और सुरक्षा संबंधी चुनौतियां पैदा कर सकती है। उन्होंने कहा कि आतंकवाद से लड़ाई संगठित सरकारी व्यवस्था के माध्यम से ही लड़ी जानी चाहिए, न कि आम जनता को हथियारबंद बनाकर।


सेना को अपनी संवैधानिक सीमा में रहने की दी सलाह

अपने संबोधन के अंतिम चरण में मौलाना फजलुर रहमान ने कहा कि लोकतंत्र तभी मजबूत हो सकता है जब प्रत्येक संवैधानिक संस्था अपने अधिकार क्षेत्र का सम्मान करे। उन्होंने कहा कि संसद कानून बनाए, न्यायपालिका न्याय दे, प्रशासन शासन चलाए और सेना राष्ट्रीय सुरक्षा की जिम्मेदारी निभाए। यही स्वस्थ लोकतांत्रिक व्यवस्था की पहचान है।उन्होंने कहा कि जनता जिसे चाहे उसे सरकार बनाने का अधिकार देती है और यही लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत है। किसी भी संस्था को जनता के इस अधिकार को प्रभावित करने का प्रयास नहीं करना चाहिए। लोकतंत्र में सत्ता परिवर्तन केवल चुनाव के माध्यम से होना चाहिए।मौलाना ने अंत में सभी संस्थाओं से संविधान का सम्मान करने, लोकतांत्रिक परंपराओं को मजबूत बनाने और राष्ट्रीय हित को सर्वोपरि रखने की अपील की। उन्होंने कहा कि यदि सभी संस्थाएं अपनी-अपनी जिम्मेदारियों का ईमानदारी से पालन करेंगी तो पाकिस्तान राजनीतिक स्थिरता और बेहतर शासन व्यवस्था की दिशा में आगे बढ़ सकेगा।