अरावली पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, बनी विशेष समिति

सुप्रीम कोर्ट ने अरावली पर्वतमाला की नई परिभाषा और सीमांकन को लेकर केंद्र सरकार की रिपोर्ट पर सवाल उठाते हुए एक उच्च स्तरीय विशेष समिति का गठन किया है। समिति अरावली क्षेत्र, खनन गतिविधियों, पहाड़ियों के वैज्ञानिक आकलन और पर्यावरणीय प्रभावों की जांच करेगी। अदालत ने 31 अगस्त 2026 तक विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है।

अरावली पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, बनी विशेष समिति

दि राइजिंग न्यूज़। नई दिल्ली। 04 जून 2026

नई परिभाषा पर उठे सवाल, वैज्ञानिक जांच के आदेश से बढ़ी केंद्र की चिंता

देश की सबसे प्राचीन पर्वत श्रृंखलाओं में शामिल अरावली को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा और महत्वपूर्ण कदम उठाया है। अदालत ने केंद्र सरकार की ओर से प्रस्तुत नई रिपोर्ट पर गंभीर सवाल उठाते हुए इसकी समीक्षा के लिए एक उच्च स्तरीय विशेष समिति का गठन कर दिया है। न्यायालय ने स्पष्ट कहा कि रिपोर्ट में कई ऐसे निष्कर्ष और मानक शामिल हैं जिनकी स्वतंत्र, निष्पक्ष और वैज्ञानिक जांच आवश्यक है। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। अदालत ने समिति को 31 अगस्त 2026 तक अपनी विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है।

पिछले वर्ष रिपोर्ट पर लगाई थी रोक

गौरतलब है कि दिसंबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की अक्टूबर 2025 की रिपोर्ट को लागू करने पर रोक लगा दी थी। अदालत का मानना था कि अरावली जैसी संवेदनशील पर्वतमाला का सीमांकन केवल प्रशासनिक मानकों के आधार पर नहीं किया जा सकता। न्यायालय ने कहा था कि इस विषय पर स्वतंत्र विशेषज्ञों की राय आवश्यक है ताकि पर्यावरणीय संतुलन, जैव विविधता और भूगर्भीय महत्व को ध्यान में रखते हुए अंतिम निर्णय लिया जा सके।

कौन करेगा जांच

अदालत द्वारा गठित विशेष समिति की अध्यक्षता भारतीय वन सेवा की वरिष्ठ अधिकारी कंचन देवी करेंगी। समिति भारतीय वानिकी अनुसंधान एवं शिक्षा परिषद के नेतृत्व में कार्य करेगी। समिति में वन, पर्यावरण, भूविज्ञान और वनस्पति विज्ञान के कई अनुभवी विशेषज्ञों को शामिल किया गया है। इनमें पूर्व वन सर्वेक्षण महानिदेशक डॉ. सुभाष अशुतोष, पूर्व भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण निदेशक डॉ. राजेंद्र कुमार शर्मा, पूर्व संयुक्त सचिव बृज मोहन सिंह राठौड़ तथा वनस्पति विज्ञान विशेषज्ञ प्रोफेसर अशोक भटनागर शामिल हैं। इसके अलावा पर्यावरण और मानव बस्तियों पर शोध करने वाले विशेषज्ञों को भी समिति से जोड़ा गया है ताकि अध्ययन अधिक व्यापक और वैज्ञानिक बन सके।

आखिर विवाद क्या है

विवाद का सबसे बड़ा कारण केंद्र सरकार की वह परिभाषा है जिसमें कहा गया था कि केवल वे पहाड़ियां अरावली का हिस्सा मानी जाएंगी जो एक-दूसरे से 500 मीटर के भीतर स्थित हों। सुप्रीम कोर्ट ने इस मानक पर गंभीर आपत्ति जताई है। अदालत का मानना है कि यदि इस परिभाषा को लागू किया गया तो अरावली का बड़ा हिस्सा संरक्षण क्षेत्र से बाहर हो सकता है। इससे खनन, निर्माण और अन्य पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाली गतिविधियों का रास्ता खुल सकता है।

खनन गतिविधियों पर भी नजर

विशेष समिति यह भी जांच करेगी कि पहाड़ियों के बीच स्थित क्षेत्रों में खनन की अनुमति दी जानी चाहिए या नहीं। पर्यावरणविदों का कहना है कि अरावली केवल अलग-अलग पहाड़ियों का समूह नहीं बल्कि एक संपूर्ण पारिस्थितिक तंत्र है। यदि पहाड़ियों के बीच के हिस्सों को संरक्षण से बाहर किया गया तो भूजल स्तर, वन्यजीवों के आवास और जलवायु संतुलन पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है।

राजस्थान की हजारों पहाड़ियों पर सवाल

अक्टूबर 2025 की रिपोर्ट में दावा किया गया था कि राजस्थान में मौजूद 12,081 पहाड़ियों में से केवल 1,048 पहाड़ियां ही निर्धारित ऊंचाई के मानक को पूरा करती हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इस दावे की सत्यता पर भी सवाल उठाए हैं। अदालत ने समिति को निर्देश दिया है कि वह जांच करे कि क्या यह आंकड़ा वैज्ञानिक तथ्यों और वास्तविक परिस्थितियों के अनुरूप है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस मानक को स्वीकार कर लिया गया तो बड़ी संख्या में पहाड़ियां पर्यावरणीय सुरक्षा के दायरे से बाहर हो सकती हैं, जिससे भविष्य में गंभीर पारिस्थितिक संकट उत्पन्न हो सकता है।

अरावली क्यों है महत्वपूर्ण

अरावली पर्वतमाला देश के कई राज्यों में फैली हुई है और इसे उत्तर भारत की पर्यावरणीय सुरक्षा कवच माना जाता है। यह मरुस्थलीकरण को रोकने, भूजल संरक्षण करने, जैव विविधता को बचाने और वायु प्रदूषण को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। विशेषज्ञों के अनुसार यदि अरावली क्षेत्र में अनियंत्रित खनन और निर्माण जारी रहता है तो इसका असर दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और आसपास के क्षेत्रों के पर्यावरण पर पड़ सकता है।

पर्यावरण संरक्षण पर दूरगामी असर

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला केवल अरावली तक सीमित नहीं माना जा रहा है। पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि समिति की रिपोर्ट भविष्य में देश के अन्य संवेदनशील पर्वतीय और वन क्षेत्रों के संरक्षण के लिए भी एक महत्वपूर्ण आधार बन सकती है। अब सभी की निगाहें विशेष समिति की रिपोर्ट पर टिकी हैं, जो यह तय करेगी कि अरावली के संरक्षण की दिशा में आगे क्या कदम उठाए जाएंगे।