कौन हैं ऋतब्रत और संदीपन, जिन्होंने बढ़ाई ममता की मुश्किलें

पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के भीतर जारी राजनीतिक संकट के केंद्र में ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा हैं। दोनों नेताओं ने चुनाव के बाद पार्टी नेतृत्व के खिलाफ मोर्चा खोलकर बड़ी संख्या में विधायकों का समर्थन हासिल किया है। उनके बढ़ते प्रभाव ने ममता बनर्जी के सामने संगठन बचाने की बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है।

कौन हैं ऋतब्रत और संदीपन, जिन्होंने बढ़ाई ममता की मुश्किलें

दि राइजिंग न्यूज़। कोलकाता। 04 जून 2026

तृणमूल में बगावत के केंद्र बने दो चेहरे, चुनाव जीतते ही शुरू हुआ सत्ता संघर्ष

पश्चिम बंगाल की राजनीति इस समय बड़े राजनीतिक भूचाल के दौर से गुजर रही है। विधानसभा चुनाव में हार के बाद तृणमूल कांग्रेस के भीतर शुरू हुई असंतोष की आग अब खुली बगावत में बदलती दिखाई दे रही है। इस पूरे घटनाक्रम के केंद्र में दो नाम सबसे अधिक चर्चा में हैं—ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा। दोनों नेताओं ने चुनाव जीतने के बाद पार्टी नेतृत्व के खिलाफ मोर्चा खोल दिया और अब बड़ी संख्या में विधायकों का समर्थन जुटाकर तृणमूल कांग्रेस के भीतर शक्ति संतुलन को चुनौती दे दी है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि इन दोनों नेताओं की रणनीति ने ममता बनर्जी के सामने अब तक की सबसे कठिन स्थिति पैदा कर दी है।

चुनाव के बाद तेज हुआ विवाद

विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस को करारी हार का सामना करना पड़ा। इसके बाद पार्टी के भीतर नेतृत्व, संगठन और चुनावी रणनीति को लेकर सवाल उठने लगे। इसी दौरान ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा ने पार्टी के भीतर बदलाव की मांग उठाई। दोनों नेताओं ने कथित तौर पर संगठनात्मक फैसलों और नेतृत्व शैली को लेकर असहमति जताई। विवाद बढ़ने पर पार्टी नेतृत्व ने दोनों को निष्कासित कर दिया, लेकिन यह फैसला उल्टा पड़ता नजर आ रहा है। आज स्थिति यह है कि बड़ी संख्या में विधायक इन दोनों नेताओं के साथ खड़े दिखाई दे रहे हैं।

कौन हैं ऋतब्रत बनर्जी

ऋतब्रत बनर्जी का राजनीतिक सफर बेहद दिलचस्प और उतार-चढ़ाव भरा रहा है। छात्र राजनीति से अपनी पहचान बनाने वाले ऋतब्रत ने शुरुआती दौर में वामपंथी राजनीति के जरिए सार्वजनिक जीवन में कदम रखा था। कोलकाता के प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानों से पढ़ाई करने के बाद उन्होंने छात्र संगठनों में सक्रिय भूमिका निभाई और युवा राजनीति में तेजी से उभरे। कम उम्र में उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली और बाद में संसद के उच्च सदन तक पहुंचने का अवसर भी मिला। हालांकि, वैचारिक मतभेदों और संगठनात्मक विवादों के चलते उनका पुरानी राजनीतिक धारा से अलगाव हो गया। इसके बाद उन्होंने ममता बनर्जी का साथ चुना और तृणमूल कांग्रेस में शामिल हो गए। पार्टी ने उन्हें महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां सौंपीं और धीरे-धीरे वह संगठन के प्रभावशाली नेताओं में गिने जाने लगे। हालिया विधानसभा चुनाव में जीत दर्ज करने के बाद उन्होंने पार्टी नेतृत्व के खिलाफ खुलकर आवाज उठाई और अब बागी गुट का प्रमुख चेहरा बन चुके हैं।

तृणमूल में कैसे बढ़ा कद

तृणमूल कांग्रेस में शामिल होने के बाद ऋतब्रत बनर्जी को श्रमिक संगठन और कई महत्वपूर्ण राजनीतिक जिम्मेदारियां दी गईं। पार्टी नेतृत्व के करीबी माने जाने वाले ऋतब्रत ने संगठन में तेजी से अपनी पकड़ मजबूत की। लेकिन चुनाव के बाद हालात बदल गए। पार्टी के भीतर असंतोष बढ़ने लगा और ऋतब्रत धीरे-धीरे असंतुष्ट विधायकों के केंद्र बिंदु बन गए। अब उन्हें विपक्ष के नेता पद के लिए आगे बढ़ाया जा रहा है और कई विधायक खुलकर उनके समर्थन में आ चुके हैं।

कौन हैं संदीपन साहा

संदीपन साहा का राजनीतिक और सामाजिक प्रभाव भी कम नहीं माना जाता। वह एक प्रभावशाली राजनीतिक परिवार से आते हैं और लंबे समय से सार्वजनिक जीवन में सक्रिय हैं। राजनीति में आने से पहले उन्होंने व्यवसायिक क्षेत्र में भी काम किया। उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद उन्होंने निजी क्षेत्र में अनुभव हासिल किया और बाद में सक्रिय राजनीति का रास्ता चुना। स्थानीय निकाय राजनीति से शुरुआत करने वाले संदीपन साहा ने संगठन में धीरे-धीरे अपनी मजबूत पहचान बनाई। उनकी संगठनात्मक क्षमता और स्थानीय जनाधार के कारण उन्हें पार्टी में महत्वपूर्ण स्थान मिला।

विधायक बनने के बाद बदले समीकरण

हालिया विधानसभा चुनाव में जीत हासिल करने के बाद संदीपन साहा का राजनीतिक कद और बढ़ गया। लेकिन विधायक बनने के कुछ समय बाद ही उन्होंने ऋतब्रत बनर्जी के साथ मिलकर पार्टी नेतृत्व के खिलाफ सवाल उठाने शुरू कर दिए। इसके बाद दोनों नेताओं ने मिलकर असंतुष्ट विधायकों को एकजुट करना शुरू किया। यही रणनीति बाद में बड़े राजनीतिक संकट में बदल गई और तृणमूल कांग्रेस के भीतर समानांतर शक्ति केंद्र उभर आया।

ममता के लिए क्यों बने चुनौती

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा की सबसे बड़ी ताकत उनका बढ़ता विधायी समर्थन है। यदि बड़ी संख्या में विधायक उनके साथ बने रहते हैं तो तृणमूल कांग्रेस के सामने संगठनात्मक और कानूनी दोनों तरह की चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं। ममता बनर्जी के सामने अब दो विकल्प दिखाई दे रहे हैं। पहला, बागी नेताओं से समझौता कर संगठन को बचाने की कोशिश करना। दूसरा, सख्त रुख अपनाकर पार्टी अनुशासन को प्राथमिकता देना। दोनों ही परिस्थितियों में राजनीतिक जोखिम बना हुआ है।

बंगाल की राजनीति में बढ़ी हलचल

तृणमूल कांग्रेस के भीतर चल रही इस खींचतान ने पश्चिम बंगाल की राजनीति को पूरी तरह बदल दिया है। आने वाले दिनों में यह संघर्ष और तेज हो सकता है। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि यदि स्थिति नहीं संभली तो यह विवाद केवल पार्टी के अंदरूनी मतभेद तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि राज्य की राजनीति पर भी व्यापक असर डाल सकता है।