जानें रामपाल कश्यप को, जिनको प्रधानमंत्री ने पहनाए जूते
दि राइजिंग न्यूज। 14 सालों की परीक्षा: मज़ाक, संघर्ष और समर्पण। 14 साल तक जूते-चप्पल न पहनने के संकल्प को निभाना आसान नहीं था। गर्मियों में तपती धरती, सर्दियों में बर्फ़ सा ठंडा रास्ता, और बारिश में कीचड़ से सने पाँव—रामपाल इन सब से गुजरते रहे। बेटे की शादी जैसे पारिवारिक समारोह में भी उन्होंने चप्पल नहीं पहनी। गाँव में लोग हँसते, ताने देते—"नए कपड़े पहन लिए, पर चप्पल नहीं पहनता!" लेकिन रामपाल अपने प्रण पर अडिग रहे।
14 सालों की परीक्षा: मज़ाक, संघर्ष और समर्पण।
दि राइजिंग न्यूज। 14 साल तक जूते-चप्पल न पहनने के संकल्प को निभाना आसान नहीं था। गर्मियों में तपती धरती, सर्दियों में बर्फ़ सा ठंडा रास्ता, और बारिश में कीचड़ से सने पाँव—रामपाल इन सब से गुजरते रहे। बेटे की शादी जैसे पारिवारिक समारोह में भी उन्होंने चप्पल नहीं पहनी। गाँव में लोग हँसते, ताने देते—"नए कपड़े पहन लिए, पर चप्पल नहीं पहनता!" लेकिन रामपाल अपने प्रण पर अडिग रहे।
"रामपाल कश्यप की 14 साल की तपस्या: संकल्प से साक्षात्कार तक"
भूमिका
हरियाणा के एक छोटे से गाँव से निकलने वाला एक साधारण मजदूर, रामपाल कश्यप, आज पूरे देश में एक मिसाल बन गए है। उसका जीवन एक ऐसी कहानी है जिसमें आस्था, दृढ़ निश्चय और समर्पण की गहराई छिपी है। एक ऐसा वादा जिसे उसने खुद से किया, और निभाया भी—बिना किसी उम्मीद के, बिना किसी दिखावे के।
एक अद्भुत संकल्प
साल 2011 भारत में राजनीतिक उथल-पुथल का समय था। रामपाल कश्यप, हरियाणा के कैथल जिले के खेड़ी गुलाम अली गाँव में रहते थे और दैनिक मजदूरी करके अपने परिवार का पेट पालते थे। पढ़ाई सिर्फ पाँचवीं तक हुई थी, लेकिन राजनीति और देश की स्थिति को लेकर उनका नजरिया बिल्कुल साफ था।
उन्हें लगता था कि अगर कोई व्यक्ति देश की दिशा बदल सकता है, तो वह हैं नरेंद्र मोदी। इसी विश्वास के साथ उन्होंने एक संकल्प लिया—"जब तक नरेंद्र मोदी भारत के प्रधानमंत्री नहीं बन जाते और मैं उनसे व्यक्तिगत रूप से नहीं मिल लेता, तब तक मैं जूते-चप्पल नहीं पहनूंगा।"
14 सालों की परीक्षा: मज़ाक, संघर्ष और समर्पण
इस संकल्प को निभाना आसान नहीं था। गर्मियों में तपती धरती, सर्दियों में बर्फ़ सा ठंडा रास्ता, और बारिश में कीचड़ से सने पाँव—रामपाल इन सब से गुजरते रहे। बेटे की शादी जैसे पारिवारिक समारोह में भी उन्होंने चप्पल नहीं पहनी। गाँव में लोग हँसते, ताने देते—"नए कपड़े पहन लिए, पर चप्पल नहीं पहनता!" लेकिन रामपाल अपने प्रण पर अडिग रहे।
मोदी बने प्रधानमंत्री, लेकिन संकल्प अधूरा
साल 2014 और फिर 2019—नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने। लेकिन रामपाल का संकल्प सिर्फ पीएम बनने तक सीमित नहीं था—उन्हें व्यक्तिगत मुलाकात भी करनी थी। तब तक उनका नंगे पाँव चलना जारी रहा।
14 अप्रैल 2025 को आखिर वह दिन आया
हरियाणा के यमुनानगर में एक जनसभा हो रही थी, जहाँ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी मौजूद थे। यही वो क्षण था जिसका रामपाल 14 साल से इंतज़ार कर रहे थे। मंच पर जब पीएम मोदी को रामपाल की तपस्या के बारे में बताया गया, तो वे खुद मंच से नीचे उतरे, रामपाल को गले लगाया और अपने हाथों से उन्हें जूते पहनाए।
पूरा देश इस भावनात्मक क्षण का साक्षी बना। पीएम मोदी ने कहा:
“रामपाल जी के प्रेम और समर्पण से मैं अभिभूत हूँ, लेकिन मैं सभी देशवासियों से अनुरोध करता हूँ कि अपने प्रेम को संकल्पों की जगह समाज सेवा और राष्ट्र निर्माण में लगाएँ।”
रामपाल की प्रतिक्रिया
अपनी आँखों में आँसू लिए रामपाल ने कहा:
“यह मेरे जीवन का सबसे पावन और महत्वपूर्ण क्षण है। मैं कभी नहीं सोच सकता था कि प्रधानमंत्री जी खुद मुझे जूते पहनाएँगे। अब मेरा संकल्प पूरा हो गया।”
राजनीतिक और सामाजिक पृष्ठभूमि
रामपाल कश्यप कोई राजनेता नहीं, कोई प्रसिद्ध चेहरा नहीं, बल्कि एक साधारण इंसान हैं। वह पिछले 40 वर्षों से बीजेपी के कार्यकर्ता रहे हैं। उनका जीवन संघर्ष और संकल्प की मिसाल है। उनका परिवार सीमित साधनों में जीवन जीता है, लेकिन आज उनके गाँव में उनका नाम बड़े गर्व से लिया जाता है।
प्रेरणा का प्रतीक
रामपाल की कहानी आज हर भारतीय के लिए एक प्रेरणा है। यह दिखाती है कि यदि विश्वास सच्चा हो और मन में समर्पण हो, तो कोई भी संकल्प अधूरा नहीं रहता। हालांकि, यह भी एक सीख है कि हमारे संकल्प व्यक्तिगत न होकर सामाजिक और राष्ट्रीय हित में होने चाहिए।
PM मोदी की अपील को समझें
"समर्पण का अर्थ केवल प्रतीकात्मक नहीं होना चाहिए, बल्कि यह समाज के लिए कुछ ठोस करने में झलकना चाहिए।" – नरेंद्र मोदी