यूरोप में 40°C जानलेवा क्यों और भारत में अपेक्षाकृत सामान्य क्यों

यूरोप और भारत में समान तापमान होने के बावजूद गर्मी का प्रभाव अलग-अलग दिखाई देता है। विशेषज्ञों के अनुसार जलवायु, नमी, भवन निर्माण शैली, जीवनशैली, शारीरिक अनुकूलन और सरकारी तैयारियों के कारण यूरोप में 40 डिग्री सेल्सियस तापमान आपात स्थिति बन जाता है, जबकि भारत में लोग अपेक्षाकृत बेहतर तरीके से इसका सामना कर लेते हैं।

यूरोप में 40°C जानलेवा क्यों और भारत में अपेक्षाकृत सामान्य क्यों

दि राइजिंग न्यूज़ | नई दिल्ली | 30 जून 2026

यूरोप में 40 डिग्री तापमान क्यों बन जाता है संकट

यूरोप के कई देशों में इन दिनों भीषण गर्मी का दौर जारी है। फ्रांस, जर्मनी, इटली और स्पेन जैसे देशों में तापमान 40 डिग्री सेल्सियस तक पहुंचते ही स्वास्थ्य आपातकाल जैसी स्थिति बन जाती है। अस्पतालों में मरीजों की संख्या बढ़ जाती है, बिजली की मांग अचानक बढ़ती है और जनजीवन प्रभावित होने लगता है। वहीं भारत के कई हिस्सों में 40 से 45 डिग्री तापमान सामान्य माना जाता है और लोग दैनिक गतिविधियां जारी रखते हैं।

नमी और वेट बल्ब तापमान का बड़ा प्रभाव

विशेषज्ञों के अनुसार केवल तापमान ही गर्मी की गंभीरता तय नहीं करता। नमी यानी ह्यूमिडिटी भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। जब तापमान के साथ नमी बढ़ जाती है तो शरीर से निकलने वाला पसीना जल्दी नहीं सूखता, जिससे शरीर का प्राकृतिक कूलिंग सिस्टम प्रभावित होता है। इसे वेट बल्ब तापमान का प्रभाव कहा जाता है। यूरोप में कई बार 40 डिग्री तापमान के साथ नमी बढ़ने पर स्थिति अधिक खतरनाक हो जाती है।

भवन निर्माण शैली भी बनती है कारण

यूरोप की अधिकांश इमारतें ठंडे मौसम को ध्यान में रखकर बनाई गई हैं। वहां मोटी दीवारें और बेहतर इंसुलेशन तो होता है, लेकिन गर्मी को बाहर निकालने की पर्याप्त व्यवस्था नहीं होती। परिणामस्वरूप गर्मी के दौरान घरों के भीतर तापमान तेजी से बढ़ जाता है। दूसरी ओर भारत में पारंपरिक रूप से ऊंची छतें, बड़ी खिड़कियां, पंखे, कूलर और एयर कंडीशनर का उपयोग अधिक देखने को मिलता है।

भारत में गर्मी के प्रति बेहतर अनुकूलन

भारत में लोग बचपन से ही गर्म मौसम के साथ जीवन बिताते हैं। अधिक पानी पीना, छाछ, नींबू पानी और अन्य शीतल पेय पदार्थों का सेवन करना आम जीवनशैली का हिस्सा है। इसके अलावा दोपहर के समय आराम और शाम को काम करने की आदत भी कई क्षेत्रों में देखने को मिलती है। यही कारण है कि भारतीय समाज गर्मी के प्रति अपेक्षाकृत अधिक अनुकूलित माना जाता है।

यूरोप में लंबा दिन और गर्म रातें बढ़ाती हैं परेशानी

यूरोप के कई देशों में गर्मियों के दौरान दिन 15 से 17 घंटे तक लंबे हो जाते हैं। लंबे समय तक सूर्य की सीधी किरणें पड़ने से तापमान लगातार ऊंचा बना रहता है। इसके अलावा रात में भी तापमान पर्याप्त रूप से नहीं गिरता, जिससे शरीर को ठंडा होने और आराम करने का अवसर नहीं मिलता। लगातार गर्मी के संपर्क में रहने से स्वास्थ्य जोखिम बढ़ जाते हैं।

बुजुर्ग और बच्चे सबसे अधिक प्रभावित

विशेषज्ञों का कहना है कि यूरोप में बुजुर्गों और बच्चों पर हीटवेव का प्रभाव अधिक पड़ता है। वहां की आबादी लंबे समय तक ठंडे मौसम में रहने की आदी रही है। ऐसे में अचानक बढ़ती गर्मी के प्रति शरीर की अनुकूलन क्षमता सीमित हो सकती है। इसी वजह से कई यूरोपीय देशों में हीटवेव के दौरान अतिरिक्त मौतों के मामले सामने आते हैं।

भारत का हीटवेव एक्शन प्लान बना सहारा

भारत में पिछले कुछ वर्षों के दौरान हीटवेव एक्शन प्लान को मजबूत किया गया है। कई राज्यों में स्कूलों की छुट्टियां, पेयजल व्यवस्था, स्वास्थ्य चेतावनी और जागरूकता अभियान चलाए जाते हैं। लोगों को दोपहर के समय धूप से बचने और पर्याप्त मात्रा में पानी पीने की सलाह दी जाती है। इससे गर्मी के प्रभाव को कुछ हद तक कम करने में मदद मिलती है।

जलवायु परिवर्तन बढ़ा रहा है चुनौती

वैज्ञानिकों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन के कारण यूरोप पहले की तुलना में तेजी से गर्म हो रहा है। जहां पहले 40 डिग्री तापमान दुर्लभ माना जाता था, वहीं अब कई देशों में यह लगभग हर वर्ष दर्ज किया जा रहा है। दूसरी ओर भारत में भी तापमान लगातार नए रिकॉर्ड बना रहा है और कई क्षेत्रों में 48 से 50 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच रहा है।

दोनों क्षेत्रों को अपनानी होंगी नई रणनीतियां

विशेषज्ञों के अनुसार यूरोप को गर्मी से निपटने के लिए सस्ते और प्रभावी कूलिंग सिस्टम, बेहतर जल व्यवस्था और जीवनशैली में बदलाव जैसे उपाय अपनाने होंगे। वहीं भारत को मौसम पूर्वानुमान, स्वास्थ्य चेतावनी प्रणाली और दीर्घकालिक शहरी नियोजन को और मजबूत करना होगा। बढ़ते तापमान के दौर में हरित शहर, ऊर्जा दक्ष इमारतें और जनजागरूकता ही भविष्य की सबसे बड़ी आवश्यकता मानी जा रही है।