उपेंद्र कुशवाहा से एमएलसी सीट का वादा था पत्र सामने आते ही बिहार में सियासी बवाल

बिहार विधान परिषद चुनाव के बाद उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी को एमएलसी सीट नहीं मिलने पर विवाद गहरा गया है। पुराने पत्र के सामने आने के बाद विपक्ष ने भाजपा पर वादा निभाने में विफल रहने का आरोप लगाया है, जिससे राज्य की राजनीति में नया घमासान शुरू हो गया है।

उपेंद्र कुशवाहा से एमएलसी सीट का वादा था पत्र सामने आते ही बिहार में सियासी बवाल

दि राइजिंग न्यूज़ | पटना | 12 जून 2026

बिहार की राजनीति में विधान परिषद की सीटों को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है। राष्ट्रीय लोक मोर्चा के प्रमुख और राज्यसभा सदस्य उपेंद्र कुशवाहा से कथित तौर पर किए गए एक राजनीतिक वादे को लेकर सियासी माहौल गर्म हो गया है। हाल ही में विधान परिषद की 10 सीटों के लिए हुए चुनाव में सभी उम्मीदवार निर्विरोध निर्वाचित घोषित हुए, लेकिन राष्ट्रीय लोक मोर्चा को वह सीट नहीं मिली जिसकी चर्चा पहले राजनीतिक समझौते के दौरान हुई थी। अब इस मामले को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष आमने-सामने दिखाई दे रहे हैं।

विधान परिषद सीट को लेकर पुराना पत्र बना चर्चा का विषय

वर्ष 2025 के विधानसभा चुनाव के दौरान राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन में शामिल हुए उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी को एक विधान परिषद सीट देने की बात कही गई थी। उस समय भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश नेतृत्व की ओर से जारी एक आधिकारिक पत्र में इस आश्वासन का उल्लेख बताया जा रहा है। अब वही पत्र सार्वजनिक होने के बाद राजनीतिक हलकों में नई बहस शुरू हो गई है। विपक्षी दल इसे सहयोगी दलों के साथ किए गए वादे से पीछे हटने का उदाहरण बता रहे हैं, जबकि सत्ता पक्ष इस मुद्दे पर फिलहाल सतर्क रुख अपनाए हुए है।

राष्ट्रीय लोक मोर्चा को सीट नहीं मिलने से बढ़ी नाराजगी

विधान परिषद चुनाव में भारतीय जनता पार्टी, जनता दल (यूनाइटेड), लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) और राष्ट्रीय जनता दल के उम्मीदवार निर्विरोध चुने गए। हालांकि राष्ट्रीय लोक मोर्चा को प्रतिनिधित्व नहीं मिलने से पार्टी समर्थकों में नाराजगी देखी जा रही है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि पहले किए गए आश्वासन के बावजूद सीट नहीं दी गई है तो इसका असर भविष्य के राजनीतिक समीकरणों पर पड़ सकता है। यह मुद्दा आने वाले समय में गठबंधन की एकजुटता के लिए भी चुनौती बन सकता है।

मंत्री पद को लेकर भी तेज हुई राजनीतिक चर्चा

राष्ट्रीय लोक मोर्चा को विधान परिषद सीट नहीं मिलने के बाद राज्य सरकार में मंत्री दीपक प्रकाश की राजनीतिक स्थिति को लेकर भी चर्चाएं तेज हो गई हैं। विपक्षी दलों का दावा है कि पार्टी को अपेक्षित राजनीतिक सम्मान नहीं मिला है। इसी कारण अब गठबंधन के भीतर असंतोष की संभावनाओं पर चर्चा शुरू हो गई है। हालांकि इस विषय पर अभी तक राष्ट्रीय लोक मोर्चा की ओर से कोई औपचारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।

विपक्ष ने साधा निशाना, लगाए गंभीर आरोप

राष्ट्रीय जनता दल सहित विपक्षी दलों ने इस पूरे मामले को लेकर भारतीय जनता पार्टी पर तीखा हमला बोला है। विपक्ष का आरोप है कि सहयोगी दलों को समय-समय पर राजनीतिक आश्वासन दिए जाते हैं, लेकिन बाद में उन्हें पूरा नहीं किया जाता। विपक्षी नेताओं का कहना है कि यदि लिखित रूप में कोई वादा किया गया था तो उसका सम्मान होना चाहिए था। इस मुद्दे को लेकर विपक्ष सरकार और गठबंधन नेतृत्व को घेरने में जुट गया है।

पूर्व प्रदेश अध्यक्ष ने टिप्पणी से किया परहेज

इस मामले में जब भारतीय जनता पार्टी के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष और वर्तमान मंत्री दिलीप जायसवाल से प्रतिक्रिया मांगी गई तो उन्होंने इस पर खुलकर कुछ भी कहने से इनकार कर दिया। उनका कहना है कि अब वह प्रदेश अध्यक्ष नहीं हैं और वर्तमान परिस्थितियों में पार्टी नेतृत्व तथा सहयोगी दलों के बीच क्या बातचीत हुई है, इसकी जानकारी उन्हें नहीं है। उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि विधानसभा चुनाव के दौरान सहयोगी दलों के साथ विभिन्न मुद्दों पर चर्चा हुई थी, लेकिन वर्तमान विवाद पर टिप्पणी करना उचित नहीं होगा।

विधान परिषद चुनाव के नतीजों ने बढ़ाई राजनीतिक हलचल

बिहार विधान परिषद की नौ रिक्त सीटों और एक उपचुनाव के लिए हुए चुनाव में सभी उम्मीदवार निर्विरोध निर्वाचित हुए हैं। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के घटक दलों ने आपसी सहमति के आधार पर उम्मीदवार उतारे थे। भारतीय जनता पार्टी और जनता दल (यूनाइटेड) को चार-चार सीटें मिलीं, जबकि लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) को एक सीट मिली। दूसरी ओर राष्ट्रीय जनता दल के उम्मीदवार सुनील सिंह भी निर्विरोध निर्वाचित हुए। इन परिणामों के बाद अब राष्ट्रीय लोक मोर्चा को प्रतिनिधित्व नहीं मिलने का मुद्दा राजनीतिक बहस का केंद्र बन गया है।

आने वाले समय में बढ़ सकता है दबाव

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि यह विवाद लंबा खिंचता है तो राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के भीतर समन्वय बनाए रखना चुनौतीपूर्ण हो सकता है। बिहार में अगले राजनीतिक मुकाबलों को देखते हुए सहयोगी दलों की संतुष्टि गठबंधन के लिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर कोई नया राजनीतिक समाधान निकलता है या नहीं