होर्मुज संकट के बीच भारत की नई तैयारी: खाद सप्लाई के लिए बदलेगा समुद्री रास्ता
होर्मुज जलडमरूमध्य पर बढ़ते तनाव के बीच भारत ने उर्वरक आयात के लिए वैकल्पिक समुद्री मार्गों पर काम शुरू कर दिया है। सऊदी अरब के यनबू बंदरगाह को केंद्र बनाकर नई सप्लाई चेन तैयार करने की योजना है, ताकि किसी भी संकट की स्थिति में किसानों को खाद की कमी का सामना न करना पड़े और कृषि उत्पादन प्रभावित न हो।
दि राइजिंग न्यूज़। नई दिल्ली। 3 जून 2026
पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य पर मंडरा रहे संकट के बीच भारत ने उर्वरक आपूर्ति को सुरक्षित रखने के लिए नई रणनीति पर काम शुरू कर दिया है। देश की कृषि व्यवस्था बड़े पैमाने पर आयातित उर्वरकों और उनसे जुड़े कच्चे माल पर निर्भर है, ऐसे में समुद्री व्यापार में किसी भी तरह की बाधा का सीधा असर खेती और खाद्य सुरक्षा पर पड़ सकता है।
भारत दुनिया के सबसे बड़े खाद्यान्न उत्पादक देशों में शामिल है, लेकिन खेती में इस्तेमाल होने वाले कई महत्वपूर्ण पोषक तत्व अब भी विदेशों से आयात किए जाते हैं। वर्ष 2024 में भारत ने उर्वरक आयात पर लगभग 7.68 अरब डॉलर खर्च किए थे। रूस भारत का सबसे बड़ा उर्वरक आपूर्तिकर्ता रहा, जबकि सऊदी अरब, ओमान, यूएई, कतर और बहरीन जैसे खाड़ी देशों की संयुक्त हिस्सेदारी करीब 37 प्रतिशत रही।
विशेषज्ञों का मानना है कि होर्मुज जलडमरूमध्य केवल तेल व्यापार का मार्ग नहीं है, बल्कि वैश्विक उर्वरक और एलएनजी सप्लाई चेन की भी महत्वपूर्ण कड़ी है। क्षेत्र में बढ़ते तनाव के कारण जहाजों की आवाजाही प्रभावित हुई है, बीमा लागत बढ़ी है और अमोनिया, नाइट्रोजन तथा सल्फर जैसे महत्वपूर्ण संसाधनों की आपूर्ति पर दबाव बढ़ा है। इसका असर अंतरराष्ट्रीय बाजार में उर्वरकों की कीमतों पर भी देखने को मिला है।
संभावित संकट से बचने के लिए भारत ने वैकल्पिक समुद्री और लॉजिस्टिक मार्गों का आकलन शुरू कर दिया है। सऊदी अरब का यनबू बंदरगाह इस रणनीति का प्रमुख केंद्र बन सकता है। भारतीय अधिकारियों ने वहां की बंदरगाह सुविधाओं, सड़क नेटवर्क और व्यापारिक क्षमता का अध्ययन किया है। भारत और सऊदी अरब के बीच शिपिंग तथा लॉजिस्टिक्स सहयोग को मजबूत करने के लिए संयुक्त कार्य समूह बनाने पर भी सहमति बनी है।
प्रस्तावित मॉडल के तहत खाड़ी क्षेत्र से आने वाले उर्वरक कार्गो को पहले फारस की खाड़ी के बंदरगाहों तक पहुंचाया जाएगा। इसके बाद लगभग 1200 किलोमीटर सड़क मार्ग के जरिए उन्हें सऊदी अरब के यनबू बंदरगाह तक ले जाया जाएगा। वहां से रेड सी और अरब सागर के रास्ते भारतीय बंदरगाहों तक आपूर्ति की जाएगी। इस व्यवस्था का उद्देश्य उर्वरक आयात को केवल होर्मुज जलडमरूमध्य पर निर्भर रहने से बचाना है।
भारत के लिए फिलहाल तत्काल संकट की स्थिति नहीं है। सरकार के अनुसार खरीफ सीजन के लिए यूरिया, डीएपी, एमओपी और अन्य प्रमुख उर्वरकों का पर्याप्त भंडार उपलब्ध है। हालांकि यदि पश्चिम एशिया में तनाव लंबा खिंचता है तो सरकार पर सब्सिडी का बोझ और बढ़ सकता है। 2024-25 में उर्वरक सब्सिडी का प्रावधान बढ़ाकर लगभग 1.92 लाख करोड़ रुपये करना पड़ा था। वहीं खरीफ 2026 के लिए फॉस्फेटिक और पोटाश उर्वरकों पर 41,534 करोड़ रुपये से अधिक सब्सिडी का अनुमान लगाया गया है।
विशेषज्ञों का कहना है कि भारत के पास फॉस्फेट और पोटाश के बड़े घरेलू भंडार नहीं हैं, जबकि सस्ती प्राकृतिक गैस की उपलब्धता भी सीमित है। यही कारण है कि देश को उर्वरक उत्पादन और आयात के लिए खाड़ी देशों पर निर्भर रहना पड़ता है। यदि क्षेत्रीय संकट लंबा चलता है तो चुनौती केवल उर्वरकों की उपलब्धता तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि बढ़ती वैश्विक कीमतों और सब्सिडी खर्च को संभालना भी सरकार के लिए बड़ी परीक्षा बन सकता है।