ईरान समझौते पर पूर्व एनएसए का हमला

अमेरिका के पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जॉन बोल्टन ने ईरान के साथ हुए नए समझौते की कड़ी आलोचना की है। उन्होंने इसे अमेरिकी रणनीतिक हितों के लिए नुकसानदायक बताते हुए कहा कि इस समझौते से ईरान को खुद को फिर से मजबूत करने का अवसर मिल सकता है।

ईरान समझौते पर पूर्व एनएसए का हमला

दि राइजिंग न्यूज़ | वॉशिंगटन | 23 जून 2026

अमेरिका के पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जॉन बोल्टन ने ईरान के साथ हुए हालिया समझौते को लेकर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की कड़ी आलोचना की है। बोल्टन ने इस समझौते को एक बड़ी रणनीतिक भूल बताते हुए कहा कि तेहरान के परमाणु कार्यक्रम और अन्य सुरक्षा चुनौतियों का समाधान किए बिना समझौता करना भविष्य में गंभीर परिणाम पैदा कर सकता है।उन्होंने कहा कि यह समझौता केवल तत्काल आर्थिक और ऊर्जा संबंधी चिंताओं को ध्यान में रखकर किया गया प्रतीत होता है, जबकि दीर्घकालिक सुरक्षा हितों की अनदेखी की गई है।

परमाणु कार्यक्रम पर उठाए सवाल

बोल्टन का कहना है कि समझौते में ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर स्पष्ट और प्रभावी समाधान शामिल नहीं है। उनके अनुसार, तेहरान की परमाणु महत्वाकांक्षाएं लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए चिंता का विषय रही हैं और इस मुद्दे को नजरअंदाज करना उचित नहीं है।उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि समझौते में ईरान के बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम, क्षेत्रीय प्रभाव बढ़ाने की रणनीति और विभिन्न सशस्त्र समूहों को कथित समर्थन जैसे मुद्दों पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया।

युद्धविराम को बताया गलती

पूर्व अमेरिकी अधिकारी ने कहा कि ईरान के साथ युद्धविराम और तनाव कम करने की प्रक्रिया से तेहरान को अपने संसाधनों को पुनर्गठित करने और स्थिति मजबूत करने का समय मिल सकता है।उनके अनुसार, यह निर्णय जल्दबाजी में लिया गया प्रतीत होता है और इससे क्षेत्रीय शक्ति संतुलन पर असर पड़ सकता है। बोल्टन ने कहा कि ऐसी परिस्थितियों में अधिक व्यापक और सख्त समझौते की आवश्यकता थी।

होर्मुज जलडमरूमध्य बना प्रमुख मुद्दा

बोल्टन ने दावा किया कि होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजरानी को लेकर पैदा हुई चिंताओं ने अमेरिकी प्रशासन पर दबाव बढ़ाया। उनका कहना है कि वैश्विक तेल आपूर्ति और ऊर्जा बाजार को स्थिर रखने के उद्देश्य से समझौते को प्राथमिकता दी गई।उन्होंने आरोप लगाया कि प्रशासन का मुख्य लक्ष्य जलडमरूमध्य को खुला रखना और अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की आपूर्ति सुनिश्चित करना था, जबकि व्यापक रणनीतिक परिणामों पर पर्याप्त विचार नहीं किया गया।

तेल कीमतों और राजनीति का प्रभाव

बोल्टन के अनुसार, वैश्विक तेल कीमतों को नियंत्रित रखने और घरेलू राजनीतिक दबावों को कम करने की आवश्यकता ने भी इस समझौते को प्रभावित किया। उन्होंने कहा कि ऊर्जा बाजार में स्थिरता महत्वपूर्ण है, लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दों को पीछे नहीं छोड़ा जाना चाहिए।उनका मानना है कि केवल आर्थिक लाभ को प्राथमिकता देना दीर्घकाल में अमेरिका और उसके सहयोगियों के लिए चुनौतीपूर्ण साबित हो सकता है।

क्षेत्रीय और वैश्विक प्रभाव पर चिंता

पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ने चेतावनी दी कि समझौते के संभावित प्रभाव केवल अमेरिका और ईरान तक सीमित नहीं रहेंगे। इसका असर पश्चिम एशिया की सुरक्षा व्यवस्था, अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद विरोधी प्रयासों और वैश्विक शक्ति संतुलन पर भी पड़ सकता है।उन्होंने कहा कि ईरान से जुड़े कई मूलभूत मुद्दे अब भी अनसुलझे हैं और यदि इन पर ठोस कदम नहीं उठाए गए तो भविष्य में नई चुनौतियां सामने आ सकती हैं।

बहस का विषय बना समझौता

ईरान के साथ हुए समझौते को लेकर अमेरिका में राजनीतिक और रणनीतिक बहस तेज हो गई है। जहां समर्थक इसे तनाव कम करने और ऊर्जा बाजार को स्थिर रखने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बता रहे हैं, वहीं आलोचकों का मानना है कि इससे ईरान को अतिरिक्त रणनीतिक लाभ मिल सकता है।फिलहाल इस समझौते के दीर्घकालिक परिणामों पर दुनिया की नजर बनी हुई है और आने वाले समय में इसकी वास्तविक प्रभावशीलता का आकलन किया जाएगा।