सबरीमाला विवाद: गैर-भक्तों की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, केंद्र से पूछा—किस आधार पर चुनौती?
सबरीमाला विवाद: गैर-भक्तों की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, केंद्र से पूछा—किस आधार पर चुनौती?
केरल के सबरीमाला मंदिर से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान बड़ा संवैधानिक सवाल उठाया गया है। कोर्ट ने केंद्र सरकार से पूछा कि जो लोग किसी धार्मिक परंपरा के अनुयायी या भक्त नहीं हैं, वे आखिर उस परंपरा को अदालत में कैसे चुनौती दे सकते हैं।
दरअसल, यह मामला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश और धार्मिक प्रथाओं से जुड़ी पुरानी बहस से जुड़ा है। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की संविधान पीठ ने ‘लोकस स्टैंडी’ यानी याचिका दायर करने के अधिकार पर सवाल उठाया। अदालत ने पूछा कि अगर कोई व्यक्ति उस धर्म या परंपरा से जुड़ा ही नहीं है, तो क्या उसे उसे चुनौती देने का अधिकार होना चाहिए।
इस दौरान यह भी सामने आया कि मूल याचिका मंदिर के भक्तों ने नहीं, बल्कि एक संगठन द्वारा दायर की गई थी, जो उस परंपरा का पालन नहीं करता। इसी पर अदालत ने गंभीर टिप्पणी करते हुए कहा कि इस पहलू पर स्पष्टता जरूरी है।
केंद्र सरकार ने भी कोर्ट में अपना पक्ष रखते हुए कहा कि धार्मिक प्रथाओं का मूल्यांकन करते समय भक्तों की आस्था और अधिकारों को ध्यान में रखना जरूरी है। सरकार का कहना है कि मंदिर में प्रवेश का अधिकार केवल व्यक्तिगत अधिकार नहीं, बल्कि अन्य श्रद्धालुओं की आस्था से भी जुड़ा हुआ है।
वहीं, सुनवाई के दौरान एक और बड़ा विवाद सामने आया, जब यह बहस छिड़ी कि क्या अदालत यह तय कर सकती है कि कोई धार्मिक प्रथा अंधविश्वास है या नहीं। केंद्र ने कहा कि अदालत कानून की विशेषज्ञ है, धर्म की नहीं, जबकि सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वह संवैधानिक मूल्यों के आधार पर ऐसे मुद्दों की जांच कर सकता है।
इस पूरे मामले का केंद्र बिंदु 2018 का वह फैसला है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर लगी पाबंदी को हटाया था। यह फैसला आज भी समीक्षा और व्यापक संवैधानिक बहस का विषय बना हुआ है।
फिलहाल, कोर्ट द्वारा उठाया गया यह सवाल आने वाले समय में धार्मिक स्वतंत्रता, आस्था और मौलिक अधिकारों के बीच संतुलन को लेकर बड़ी दिशा तय कर सकता है।