बागियों में फूट से ममता को मिली नई उम्मीद
पश्चिम बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस के भीतर मची बगावत ने ममता बनर्जी के नेतृत्व को अब तक की सबसे बड़ी चुनौती दी है। 58 बागी विधायकों द्वारा ऋतब्रत बनर्जी को विपक्ष का नेता चुने जाने और विधानसभा अध्यक्ष से मान्यता मिलने के बाद पार्टी में बड़ा राजनीतिक संकट खड़ा हो गया। हालांकि अब बागी खेमे के भीतर ही मतभेद उभरते दिखाई दे रहे हैं। कई विधायक अब भी ममता बनर्जी को सर्वोच्च नेता बनाए रखने की वकालत कर रहे हैं। यही स्थिति ममता बनर्जी के लिए उम्मीद की नई किरण बनकर उभरी है।
दि राइजिंग न्यूज़। कोलकाता। 05 जून 2026
तृणमूल कांग्रेस के इतिहास का सबसे बड़ा संकट
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में सत्ता गंवाने के बाद तृणमूल कांग्रेस लगातार राजनीतिक दबाव का सामना कर रही है। इसी बीच पार्टी के भीतर असंतोष खुलकर सामने आया और 58 विधायकों ने अलग राह पकड़ ली। बागी विधायकों ने ऋतब्रत बनर्जी को अपना नेता चुना और विधानसभा में अलग पहचान का दावा पेश किया। इसके बाद विधानसभा अध्यक्ष ने उन्हें विपक्ष के नेता के रूप में मान्यता दे दी। इस घटनाक्रम को तृणमूल कांग्रेस के 28 वर्ष के इतिहास की सबसे बड़ी टूट माना जा रहा है।
ममता बनर्जी के लिए क्यों बनी हुई है उम्मीद
राजनीतिक संकट के बावजूद ममता बनर्जी पूरी तरह घिरी हुई नजर नहीं आ रही हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह बागी खेमे के भीतर बढ़ते मतभेद हैं। हालिया बैठकों में यह स्पष्ट हुआ कि सभी बागी विधायक एक मत नहीं हैं। कई विधायक चाहते हैं कि चाहे संगठनात्मक ढांचा बदले या नया नेतृत्व उभरे, लेकिन ममता बनर्जी की भूमिका कम नहीं होनी चाहिए। कुछ विधायक उन्हें केवल सलाहकार नहीं बल्कि शीर्ष पद पर बनाए रखने की मांग कर रहे हैं।
बागी खेमे में क्यों बढ़ रहा मतभेद
तृणमूल से अलग हुए विधायकों का एक वर्ग पार्टी में बदलाव चाहता है, जबकि दूसरा वर्ग अब भी ममता बनर्जी को पार्टी का सबसे बड़ा चेहरा मानता है। रिपोर्टों के अनुसार बागी विधायकों की महत्वपूर्ण बैठक में सभी विधायक शामिल नहीं हुए। 58 में से केवल 32 विधायकों की उपस्थिति ने कई सवाल खड़े कर दिए। इससे संकेत मिला कि कुछ विधायक अपने फैसले को लेकर असमंजस में हैं या फिर वे पूरी तरह पुराने नेतृत्व से दूरी बनाने के पक्ष में नहीं हैं।
अभिषेक बनर्जी को लेकर भी असहमति
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि मौजूदा संकट केवल ममता बनर्जी के नेतृत्व को लेकर नहीं है, बल्कि पार्टी के भविष्य और नेतृत्व के स्वरूप को लेकर भी है। बागी विधायकों के एक बड़े वर्ग की नाराजगी का केंद्र अभिषेक बनर्जी का बढ़ता प्रभाव बताया जा रहा है। कई नेताओं का मानना है कि संगठनात्मक फैसलों में बदलाव की जरूरत है, जबकि कुछ नेता परिवार आधारित नेतृत्व की आलोचना कर रहे हैं। यही कारण है कि बागी खेमे में भी एकरूपता दिखाई नहीं दे रही है।
ऋतब्रत बनर्जी की बढ़ती भूमिका
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे अधिक चर्चा ऋतब्रत बनर्जी की हो रही है। कभी ममता बनर्जी के करीबी माने जाने वाले ऋतब्रत अब बागी खेमे का चेहरा बनकर उभरे हैं। उन्होंने दावा किया है कि समय के साथ उनके समर्थन में और वृद्धि होगी। विधानसभा में विपक्ष के नेता की मान्यता मिलने के बाद उनकी राजनीतिक स्थिति पहले से अधिक मजबूत दिखाई दे रही है।
विधानसभा अध्यक्ष के फैसले ने बढ़ाई मुश्किल
तृणमूल नेतृत्व ने बागी नेताओं के खिलाफ कार्रवाई की थी, लेकिन विधानसभा अध्यक्ष ने कुछ मामलों में पार्टी की कार्रवाई को प्रक्रिया संबंधी आधार पर स्वीकार नहीं किया। अध्यक्ष ने यह भी माना कि विपक्ष के नेता के पद के लिए आवश्यक संख्या बागी खेमे के पास मौजूद थी। इस फैसले ने तृणमूल नेतृत्व की राजनीतिक और कानूनी चुनौतियां बढ़ा दी हैं।
आगे क्या हो सकता है
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले दिनों में यह संघर्ष और तेज हो सकता है। यदि बागी खेमे में मतभेद बढ़ते हैं तो ममता बनर्जी को संगठन पर अपनी पकड़ मजबूत करने का अवसर मिल सकता है। वहीं यदि ऋतब्रत बनर्जी अपने साथ अधिक नेताओं को जोड़ने में सफल रहते हैं तो तृणमूल कांग्रेस का संकट और गहरा सकता है। फिलहाल स्थिति ऐसी है कि न तो बागी खेमा पूरी तरह एकजुट दिखाई दे रहा है और न ही ममता बनर्जी का राजनीतिक प्रभाव पूरी तरह समाप्त हुआ है। तृणमूल कांग्रेस की यह लड़ाई अब केवल बगावत की कहानी नहीं रह गई है। यह नेतृत्व, संगठन और भविष्य की दिशा तय करने की लड़ाई बन चुकी है। 58 विधायकों की बगावत ने ममता बनर्जी को बड़ा झटका जरूर दिया है, लेकिन बागियों के भीतर उभरती फूट ने उनके लिए वापसी की संभावना भी जीवित रखी है। आने वाले सप्ताह यह तय करेंगे कि पश्चिम बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस एकजुट होती है या फिर विभाजन और गहरा होता है।