विवाद के बाद एनसीईआरटी का यू टर्न, डांसिंग गर्ल की मूल तस्वीर होगी बहाल

एनसीईआरटी की कक्षा 9 की नई पुस्तक में सिंधु घाटी सभ्यता की प्रसिद्ध डांसिंग गर्ल प्रतिमा की बदली हुई तस्वीर प्रकाशित होने के बाद विवाद खड़ा हो गया. इतिहासकारों और शिक्षाविदों की आपत्तियों के बाद एनसीईआरटी ने तस्वीर को मूल स्वरूप में बहाल करने का फैसला किया है. सबसे पहले यह सुधार डिजिटल संस्करण में लागू किया जाएगा.

विवाद के बाद एनसीईआरटी का यू टर्न, डांसिंग गर्ल की मूल तस्वीर होगी बहाल

दि राइजिंग न्यूज़ | नई दिल्ली | 16 जून 2026

कक्षा 9 की किताब से शुरू हुआ विवाद

राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद यानी एनसीईआरटी की नई कक्षा 9 की पुस्तक में प्रकाशित सिंधु घाटी सभ्यता की प्रसिद्ध डांसिंग गर्ल प्रतिमा की तस्वीर को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है. इतिहासकारों, पुरातत्व विशेषज्ञों और शिक्षाविदों ने दावा किया कि पुस्तक में प्रकाशित तस्वीर मूल प्रतिमा से अलग दिखाई गई है, जिससे छात्रों को ऐतिहासिक धरोहर के बारे में गलत जानकारी मिल सकती है. यह तस्वीर पुस्तक के पहले अध्याय इतिहास ऑफ आर्ट्स में प्रकाशित की गई थी. जैसे ही शिक्षकों और विशेषज्ञों ने इसकी तुलना मूल प्रतिमा से की, दोनों के बीच स्पष्ट अंतर सामने आया. इसके बाद सोशल मीडिया और शैक्षणिक जगत में इस मुद्दे पर व्यापक चर्चा शुरू हो गई.

क्या है डांसिंग गर्ल प्रतिमा का इतिहास

डांसिंग गर्ल सिंधु घाटी सभ्यता की सबसे प्रसिद्ध कलाकृतियों में से एक मानी जाती है. लगभग साढ़े चार हजार वर्ष पुरानी यह कांस्य प्रतिमा मोहनजोदड़ो की खुदाई के दौरान प्राप्त हुई थी. करीब 10.5 सेंटीमीटर ऊंची इस प्रतिमा में एक युवती को आत्मविश्वास से खड़े हुए दिखाया गया है. उसकी एक भुजा कमर पर टिकी हुई है जबकि दूसरा हाथ नीचे की ओर है. प्रतिमा में युवती के शरीर पर कई चूड़ियां और एक हार भी दिखाई देता है. यह प्रतिमा उस समय की कला, धातु शिल्प और सांस्कृतिक विकास का उत्कृष्ट उदाहरण मानी जाती है.

तस्वीर में क्या बदलाव किया गया था

विवाद का मुख्य कारण यह था कि पुस्तक में प्रकाशित तस्वीर में प्रतिमा के कुछ हिस्सों को शेडिंग और रंगों की सहायता से ढका हुआ दिखाया गया था.  इस बदलाव के कारण प्रतिमा का वास्तविक स्वरूप बदल गया और छात्रों के सामने मूल कलाकृति की जगह संशोधित छवि प्रस्तुत की गई. एनसीईआरटी की कक्षा 6 की सामाजिक विज्ञान की पुस्तक में यही प्रतिमा लगभग अपने मूल स्वरूप में प्रकाशित की गई है. इसी कारण विशेषज्ञों ने सवाल उठाया कि कक्षा 9 की पुस्तक में बदलाव की आवश्यकता क्यों महसूस की गई.

विवाद बढ़ने पर एनसीईआरटी की सफाई

विवाद बढ़ने के बाद एनसीईआरटी ने इस मामले पर प्रतिक्रिया दी. एनसीईआरटी के निदेशक दिनेश प्रसाद सकलानी ने बताया कि मामला सामने आने के तुरंत बाद संबंधित विभाग को जांच के निर्देश दिए गए. विषय विशेषज्ञों के साथ विस्तृत चर्चा और समीक्षा के बाद यह निर्णय लिया गया है कि पुस्तक में प्रकाशित संशोधित तस्वीर को हटाकर डांसिंग गर्ल की मूल तस्वीर को शामिल किया जाएगा. एनसीईआरटी के अनुसार ऐतिहासिक तथ्यों और कलाकृतियों की प्रामाणिकता बनाए रखना संस्था की प्राथमिकता है.

सबसे पहले डिजिटल संस्करण में होगा बदलाव

एनसीईआरटी ने स्पष्ट किया कि सबसे पहले यह सुधार पुस्तक के डिजिटल संस्करण में लागू किया जाएगा. इसके बाद जब पुस्तक का संशोधित मुद्रित संस्करण प्रकाशित होगा तब उसमें भी डांसिंग गर्ल की मूल तस्वीर ही शामिल की जाएगी.  इससे छात्रों और शिक्षकों को सही और प्रमाणिक सामग्री उपलब्ध कराई जा सकेगी.

लॉस्ट वैक्स तकनीक का अद्भुत उदाहरण

डांसिंग गर्ल प्रतिमा केवल ऐतिहासिक दृष्टि से ही नहीं बल्कि तकनीकी दृष्टि से भी बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है. यह प्रतिमा लॉस्ट वैक्स तकनीक यानी मोम ढलाई विधि से बनाई गई थी. इस प्रक्रिया में पहले मोम का मॉडल तैयार किया जाता है और फिर उसके ऊपर मिट्टी की परत चढ़ाकर धातु ढाली जाती है.  यह तकनीक आज भी पश्चिम बंगाल, झारखंड और छत्तीसगढ़ के कुछ क्षेत्रों में पारंपरिक शिल्पकारों द्वारा इस्तेमाल की जाती है.

इतिहासकार मिशेल डैनिनो ने जताई आपत्ति

इस विवाद पर इतिहासकार और शिक्षाविद मिशेल डैनिनो ने भी प्रतिक्रिया दी है. डैनिनो एनसीईआरटी की नई सामाजिक विज्ञान पुस्तकों के विकास से जुड़ी समिति का हिस्सा रह चुके हैं. उन्होंने बताया कि पहले यह तर्क दिया गया था कि डांसिंग गर्ल की मूल तस्वीर छोटे बच्चों के लिए उपयुक्त नहीं मानी गई थी. लेकिन शिक्षकों के साथ चर्चा के दौरान यह तर्क स्वीकार नहीं किया गया क्योंकि कक्षा में इस तस्वीर को लेकर कभी कोई समस्या सामने नहीं आई थी. डैनिनो ने कहा कि भारतीय कला पर आधारित अध्याय में किसी ऐतिहासिक कलाकृति का मूल स्वरूप बदलना उचित नहीं माना जा सकता.

कला और इतिहास की प्रामाणिकता पर बहस

किसी भी ऐतिहासिक या पुरातात्विक वस्तु की तस्वीर को बिना ठोस कारण बदला जाना शिक्षा के मूल उद्देश्य के विपरीत है.छात्र इतिहास को पुस्तकों के माध्यम से समझते हैं और यदि उन्हें संशोधित या परिवर्तित स्वरूप दिखाया जाए तो वास्तविक तथ्यों की समझ प्रभावित हो सकती है. किसी कलाकृति में बदलाव केवल उस स्थिति में उचित माना जा सकता है जब वह क्षतिग्रस्त हो और विशेषज्ञ उसके पुनर्निर्माण का प्रयास कर रहे हों.

समीक्षा के बाद आगे की कार्रवाई

एनसीईआरटी ने पूरे मामले को पुस्तक विकास टीम के पास समीक्षा के लिए भेज दिया है. टीम यह जांच करेगी कि तस्वीर में बदलाव किस कारण से किया गया और भविष्य में ऐसी स्थिति दोबारा न हो इसके लिए क्या कदम उठाए जाने चाहिए. संस्था ने यह भी स्पष्ट किया है कि कक्षा 6 की पुस्तक में डांसिंग गर्ल की मूल तस्वीर पहले से ही प्रकाशित है और अब कक्षा 9 की पुस्तक में भी उसी स्वरूप को बहाल किया जाएगा.

शिक्षा जगत में जारी है चर्चा

डांसिंग गर्ल प्रतिमा को लेकर शुरू हुआ यह विवाद केवल एक तस्वीर तक सीमित नहीं रहा बल्कि इसने शिक्षा, इतिहास और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण को लेकर व्यापक बहस छेड़ दी है.  पाठ्यपुस्तकों में ऐतिहासिक तथ्यों और कलाकृतियों की प्रस्तुति पूरी तरह प्रमाणिक और मूल स्वरूप के अनुरूप होनी चाहिए ताकि आने वाली पीढ़ियां अपने इतिहास और सांस्कृतिक धरोहर को सही रूप में समझ सकें.