भारतीय सेना के शीर्ष पद पर धीरज सेठ, 30 जून को संभालेंगे कार्यभार

राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद लेफ्टिनेंट जनरल धीरज सेठ को भारत का अगला थल सेनाध्यक्ष नियुक्त किया गया है। वह 30 जून 2026 को वर्तमान सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी का स्थान लेंगे। लगभग चार दशक के सैन्य अनुभव वाले धीरज सेठ तीन दशक बाद सेना की कमान संभालने वाले पहले बख्तरबंद कोर अधिकारी होंगे।

भारतीय सेना के शीर्ष पद पर धीरज सेठ, 30 जून को संभालेंगे कार्यभार

दि राइजिंग न्यूज़ | नई दिल्ली | 13 जून 2026

भारतीय सेना के नेतृत्व में बड़ा बदलाव होने जा रहा है। केंद्र सरकार ने लेफ्टिनेंट जनरल धीरज सेठ को देश का अगला थल सेनाध्यक्ष नियुक्त करने का फैसला किया है। राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद रक्षा मंत्रालय ने उनकी नियुक्ति का आधिकारिक आदेश जारी कर दिया है। वर्तमान थल सेनाध्यक्ष जनरल उपेंद्र द्विवेदी के सेवानिवृत्त होने के बाद लेफ्टिनेंट जनरल धीरज सेठ 30 जून 2026 को सेना की कमान संभालेंगे। उनकी नियुक्ति को भारतीय सेना के लिए एक महत्वपूर्ण और रणनीतिक निर्णय माना जा रहा है।

राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद जारी हुआ नियुक्ति आदेश

रक्षा मंत्रालय द्वारा जारी आदेश के अनुसार राष्ट्रपति ने लेफ्टिनेंट जनरल धीरज सेठ को अगले थल सेनाध्यक्ष के रूप में नियुक्त करने की स्वीकृति प्रदान कर दी है। मंत्रालय की ओर से जारी पत्र में संबंधित सभी विभागों और सैन्य इकाइयों को इस फैसले की जानकारी दे दी गई है। इसके साथ ही सेना में नेतृत्व परिवर्तन की प्रक्रिया औपचारिक रूप से शुरू हो गई है। माना जा रहा है कि उनके अनुभव और नेतृत्व क्षमता को देखते हुए सरकार ने यह महत्वपूर्ण जिम्मेदारी उन्हें सौंपी है।लेफ्टिनेंट जनरल धीरज सेठ का कार्यकाल 31 अगस्त 2028 तक रहने की संभावना है। इस दौरान उनके सामने सीमाई सुरक्षा, आधुनिक सैन्य तकनीकों को अपनाने और भविष्य की चुनौतियों से निपटने जैसी कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां होंगी। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि उनके लंबे अनुभव का लाभ भारतीय सेना को आने वाले वर्षों में मिलेगा।

चार दशक से अधिक का सैन्य अनुभव, अनेक महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाईं

लेफ्टिनेंट जनरल धीरज सेठ का सैन्य जीवन अत्यंत गौरवशाली रहा है। वह महाराष्ट्र के पुणे जिले स्थित राष्ट्रीय रक्षा अकादमी के पूर्व छात्र रहे हैं और वर्ष 1986 में बख्तरबंद कोर में नियुक्त हुए थे। इसके बाद उन्होंने भारतीय सेना में लगातार विभिन्न महत्वपूर्ण पदों पर अपनी सेवाएं दीं। करीब चार दशक लंबे सैन्य करियर में उन्होंने देश की सुरक्षा से जुड़े कई संवेदनशील अभियानों का नेतृत्व किया है।उन्होंने कठिन भौगोलिक परिस्थितियों, सीमावर्ती क्षेत्रों और आतंकवाद प्रभावित इलाकों में सफलतापूर्वक जिम्मेदारियां निभाई हैं। जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद विरोधी अभियानों के दौरान उनके नेतृत्व की विशेष सराहना की गई थी। सेना के भीतर उन्हें एक कुशल रणनीतिकार और मजबूत नेतृत्वकर्ता के रूप में देखा जाता है।

रेगिस्तान से लेकर सीमावर्ती मोर्चों तक संभाली अहम जिम्मेदारी

अपने लंबे सैन्य करियर के दौरान धीरज सेठ ने विभिन्न स्तरों पर कमान संभाली है। उन्होंने रेगिस्तानी क्षेत्रों में एक बख्तरबंद रेजिमेंट का नेतृत्व किया, वहीं विकसित क्षेत्रों में बख्तरबंद ब्रिगेड की कमान भी संभाली। इसके अलावा जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद विरोधी बल का नेतृत्व करते हुए उन्होंने कई महत्वपूर्ण अभियानों को दिशा दी।बाद में उन्हें सुदर्शन चक्र कोर की कमान सौंपी गई, जो भारतीय सेना की सबसे महत्वपूर्ण स्ट्राइक संरचनाओं में से एक मानी जाती है। इस भूमिका में उन्होंने युद्धक तैयारी, सैनिक प्रशिक्षण और सामरिक अभियानों को नई दिशा देने का कार्य किया। उनकी कार्यशैली को सेना के भीतर अत्यंत प्रभावी माना जाता रहा है।

राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय अभियानों का भी मिला अनुभव

लेफ्टिनेंट जनरल धीरज सेठ ने दिल्ली में जनरल ऑफिसर कमांडिंग के रूप में भी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाईं। इस दौरान उन्होंने कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर के सैन्य अभियानों का नेतृत्व किया। विभिन्न देशों की सेनाओं के साथ समन्वय और सामरिक सहयोग बढ़ाने में भी उनकी भूमिका महत्वपूर्ण रही है।उनके अनुभव का दायरा केवल युद्धक मोर्चों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि प्रशासनिक, रणनीतिक और कूटनीतिक स्तर पर भी उन्होंने सेना का प्रभावी नेतृत्व किया है। यही कारण है कि उन्हें सेना के शीर्ष पद के लिए सबसे उपयुक्त अधिकारियों में गिना जा रहा था।

दक्षिणी और पश्चिम-दक्षिणी कमान का सफल नेतृत्व

सेना कमांडर के रूप में धीरज सेठ ने दक्षिण-पश्चिमी कमान और दक्षिणी कमान दोनों का नेतृत्व किया है। ये दोनों कमान देश की सुरक्षा व्यवस्था में बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती हैं। विशेष रूप से पश्चिमी सीमा पर पाकिस्तान से सटी संवेदनशील सीमाओं की सुरक्षा में इनकी अहम भूमिका रहती है।उनके नेतृत्व में इन कमानों ने कई सैन्य अभ्यासों और परिचालन तैयारियों को सफलतापूर्वक पूरा किया। सीमाई सुरक्षा को मजबूत करने और आधुनिक युद्धक तैयारियों को बढ़ाने के लिए उन्होंने कई महत्वपूर्ण कदम उठाए। सेना के वरिष्ठ अधिकारियों के बीच उनकी रणनीतिक सोच को काफी सम्मान मिलता है।

तीन दशक बाद बख्तरबंद कोर के अधिकारी को मिली सेना की सर्वोच्च जिम्मेदारी

धीरज सेठ की नियुक्ति इसलिए भी ऐतिहासिक मानी जा रही है क्योंकि लगभग तीन दशक बाद किसी बख्तरबंद कोर के अधिकारी को थल सेनाध्यक्ष बनाया गया है। इससे पहले वर्ष 1997 में जनरल शंकर रॉय चौधरी ने सेना प्रमुख के रूप में जिम्मेदारी संभाली थी। उसके बाद लंबे समय तक पैदल सेना और तोपखाना शाखा के अधिकारियों का ही इस पद पर वर्चस्व रहा। बख्तरबंद कोर से आने वाले अधिकारी का सेना प्रमुख बनना भारतीय सेना की भविष्य की युद्ध रणनीतियों में बदलाव का संकेत भी हो सकता है। आधुनिक युद्ध में तेज गति, तकनीक और आक्रामक क्षमता की भूमिका लगातार बढ़ रही है, ऐसे में यह नियुक्ति विशेष महत्व रखती है।

पाकिस्तान सीमा की सुरक्षा में निभाई महत्वपूर्ण भूमिका

लेफ्टिनेंट जनरल धीरज सेठ ने अपने करियर के दौरान पंजाब के बठिंडा से लेकर गुजरात के कच्छ तक फैली पाकिस्तान सीमा से जुड़े महत्वपूर्ण सैन्य क्षेत्रों की कमान संभाली है। इन क्षेत्रों को देश की सुरक्षा के दृष्टिकोण से अत्यंत संवेदनशील माना जाता है। सीमा पर सतर्कता बनाए रखने और किसी भी चुनौती का मुकाबला करने में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण रही है।सैन्य जानकारों का मानना है कि सीमाई सुरक्षा और युद्धक रणनीति का उनका अनुभव उन्हें एक प्रभावशाली थल सेनाध्यक्ष साबित कर सकता है। आने वाले समय में भारतीय सेना के आधुनिकीकरण और सीमाओं की सुरक्षा को और मजबूत करने में उनकी भूमिका बेहद महत्वपूर्ण रहने वाली है।

भारतीय सेना को मिलेगा अनुभवी नेतृत्व

देश के नए थल सेनाध्यक्ष के रूप में धीरज सेठ की नियुक्ति को भारतीय सेना के लिए एक महत्वपूर्ण पड़ाव माना जा रहा है। उनके पास युद्धक अनुभव, प्रशासनिक क्षमता, रणनीतिक समझ और नेतृत्व कौशल का व्यापक अनुभव है। ऐसे समय में जब क्षेत्रीय और वैश्विक सुरक्षा चुनौतियां तेजी से बदल रही हैं, भारतीय सेना को एक अनुभवी और दूरदर्शी नेतृत्व मिलने जा रहा है।30 जून 2026 को औपचारिक रूप से पदभार ग्रहण करने के बाद उनकी प्राथमिकता सेना की युद्धक क्षमता को और मजबूत करना, आधुनिक तकनीकों को अपनाना तथा सीमाओं की सुरक्षा को और अधिक सशक्त बनाना होगी। देश की रक्षा व्यवस्था में यह बदलाव आने वाले वर्षों की दिशा तय करने वाला माना जा रहा है।