ईरान युद्ध पर ट्रंप-नेतन्याहू आमने-सामने! फिर भी क्यों अटूट हैं अमेरिका-इजरायल रिश्ते
ईरान युद्ध को लेकर डोनाल्ड ट्रंप और बेंजामिन नेतन्याहू के बीच मतभेद खुलकर सामने आ गए हैं। इसके बावजूद अमेरिका और इजरायल के रिश्ते क्यों मजबूत बने हुए हैं, जानिए पूरी रिपोर्ट।
दि राइजिंग न्यूज़ | वॉशिंगटन | 22 मई 2026
ईरान युद्ध को लेकर अमेरिका और इजरायल के बीच अब खुलकर मतभेद सामने आने लगे हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप जहां युद्ध को रोककर समझौते की दिशा में आगे बढ़ना चाहते हैं, वहीं इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ईरान पर लगातार सैन्य दबाव बनाए रखने के पक्ष में हैं। दोनों नेताओं के बीच हाल ही में हुई तीखी बातचीत ने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। इसके बावजूद एक बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि आखिर इतने मतभेदों के बाद भी अमेरिका और इजरायल के रिश्ते क्यों नहीं टूटते।
ट्रंप और नेतन्याहू के बीच बढ़ा टकराव
बीस मई को राष्ट्रपति ट्रंप और प्रधानमंत्री नेतन्याहू के बीच करीब एक घंटे तक लंबी बातचीत हुई। इस दौरान ट्रंप ने ईरान के साथ युद्धविराम और समझौते की संभावनाओं पर चर्चा की। अमेरिका, कतर और पाकिस्तान की मध्यस्थता में एक प्रारंभिक समझौते की तैयारी की बात भी सामने आई। लेकिन नेतन्याहू इस प्रस्ताव से बिल्कुल सहमत नहीं दिखाई दिए। उनका साफ मानना है कि अभी ईरान पर दबाव बनाए रखना जरूरी है।सूत्रों के मुताबिक बातचीत के दौरान माहौल बेहद तनावपूर्ण हो गया था। नेतन्याहू ने ट्रंप से साफ कहा कि अगर अभी हमले रोके गए तो ईरान को दोबारा मजबूत होने का मौका मिल जाएगा। वहीं ट्रंप का मानना है कि लंबा युद्ध अमेरिका की अर्थव्यवस्था और राजनीति दोनों के लिए नुकसानदायक साबित हो सकता है। इसी वजह से दोनों नेताओं के बीच रणनीति को लेकर गहरा मतभेद दिखाई दे रहा है।
ईरान युद्ध ने बढ़ाई अमेरिका की मुश्किलें
ईरान की जवाबी कार्रवाई के बाद हालात और ज्यादा गंभीर हो गए हैं। होर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव बढ़ने से दुनिया की बड़ी तेल आपूर्ति प्रभावित हुई है। इसका असर अमेरिका समेत कई देशों की अर्थव्यवस्था पर दिखाई देने लगा है। अमेरिका में पेट्रोल और गैस के दाम तेजी से बढ़ रहे हैं, जिससे आम लोगों की नाराजगी बढ़ती जा रही है। ट्रंप पर घरेलू दबाव लगातार बढ़ रहा है। आर्थिक मोर्चे पर जनता की नाराजगी उनकी लोकप्रियता को नुकसान पहुंचा रही है। यही कारण है कि ट्रंप अब युद्ध की जगह समझौते की राह तलाश रहे हैं। दूसरी तरफ नेतन्याहू का मानना है कि अगर अभी युद्ध रोका गया तो भविष्य में ईरान और बड़ा खतरा बन सकता है।
नेतन्याहू की तीन बड़ी शर्तें
इजरायल ने ईरान के सामने तीन अहम शर्तें रखी हैं। पहली शर्त यह है कि ईरान अपने संवर्धित यूरेनियम कार्यक्रम को पूरी तरह खत्म करे। दूसरी शर्त बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम बंद करने की है। तीसरी और सबसे अहम शर्त यह है कि ईरान मध्य पूर्व में सक्रिय अपने समर्थित सशस्त्र संगठनों को सहायता देना बंद करे। इजरायल का कहना है कि इन शर्तों के बिना किसी भी समझौते का कोई मतलब नहीं है। नेतन्याहू मानते हैं कि अगर ईरान को बिना दबाव के छोड़ दिया गया तो वह भविष्य में और ज्यादा खतरनाक बन सकता है। यही वजह है कि इजरायल सैन्य कार्रवाई जारी रखने पर जोर दे रहा है।
अमेरिका के लिए क्यों अहम है इजरायल
अमेरिका और इजरायल के रिश्ते सिर्फ राजनीतिक नहीं बल्कि रणनीतिक भी हैं। उन्नीस सौ सड़सठ के युद्ध के बाद अमेरिका ने इजरायल को मध्य पूर्व में अपनी सबसे मजबूत साझेदार ताकत के रूप में देखना शुरू किया। उस समय सोवियत संघ अरब देशों को समर्थन दे रहा था और अमेरिका को क्षेत्र में एक मजबूत सहयोगी की जरूरत थी।इजरायल ने समय के साथ अमेरिका की इस जरूरत को पूरा किया। अमेरिका के कई पूर्व अधिकारियों ने इजरायल को मध्य पूर्व में अपना सबसे भरोसेमंद रणनीतिक साथी बताया है। यही कारण है कि दोनों देशों के बीच समय-समय पर मतभेद होने के बावजूद रिश्ते कमजोर नहीं पड़ते।
अरबों डॉलर की सैन्य सहायता का खेल
अमेरिका हर साल इजरायल को अरबों डॉलर की सैन्य सहायता देता है। यह सहायता केवल आर्थिक मदद नहीं बल्कि अमेरिकी रक्षा उद्योग के लिए भी बड़ा कारोबार है। इजरायल को मिलने वाले अधिकांश धन का उपयोग अमेरिकी हथियार कंपनियों से रक्षा उपकरण खरीदने में होता है। इससे अमेरिकी हथियार उद्योग को भारी फायदा पहुंचता है। इजरायल अमेरिका के लिए आधुनिक हथियारों की परीक्षण भूमि भी बन चुका है। कई नई सैन्य तकनीकों का इस्तेमाल पहले इजरायल में किया जाता है। यही कारण है कि अमेरिका किसी भी हाल में इजरायल से दूरी बनाने का जोखिम नहीं उठाना चाहता।
तकनीक और सुरक्षा का गहरा गठजोड़
अमेरिका और इजरायल के रिश्ते केवल सैन्य मदद तक सीमित नहीं हैं। दोनों देश रक्षा तकनीक, मिसाइल सुरक्षा प्रणाली और खुफिया सहयोग में भी बेहद करीब हैं। आयरन डोम जैसी मिसाइल रक्षा प्रणाली को विकसित करने में अमेरिका ने बड़ी भूमिका निभाई है। इस तकनीक से दोनों देशों को रणनीतिक लाभ मिला है।अमेरिका और इजरायल का रिश्ता अब केवल राजनीति का नहीं बल्कि तकनीकी और सुरक्षा साझेदारी का भी हिस्सा बन चुका है। यही वजह है कि नेताओं के बदलने या राजनीतिक मतभेद बढ़ने के बावजूद यह संबंध कमजोर नहीं होते।
क्या टूट सकते हैं अमेरिका-इजरायल रिश्ते
विदेश मामलों के जानकारों का मानना है कि ट्रंप और नेतन्याहू के बीच मतभेद गंभीर जरूर हैं, लेकिन इससे दोनों देशों के रिश्तों पर बड़ा असर पड़ने की संभावना कम है। पिछले अठहत्तर वर्षों में चौदह अमेरिकी राष्ट्रपति बदले, लेकिन इजरायल के प्रति अमेरिका की नीति में कोई बड़ा बदलाव नहीं आया। अमेरिका और इजरायल के रिश्तों की बुनियाद रणनीति, सुरक्षा, पैसा और तकनीक पर टिकी हुई है। यही कारण है कि व्यक्तिगत मतभेदों के बावजूद दोनों देश एक-दूसरे के सबसे बड़े सहयोगी बने हुए हैं। फिलहाल पूरी दुनिया की नजर इस बात पर टिकी है कि ईरान युद्ध समझौते की तरफ बढ़ेगा या फिर मध्य पूर्व में एक और बड़ा सैन्य संघर्ष देखने को मिलेगा।