सर्वोच्च न्यायालय में उठी महिला खतना पर रोक की मांग, दुनिया भर में क्यों बढ़ रहा विरोध
महिला खतना को लेकर सर्वोच्च न्यायालय में उठी बहस के बाद यह मुद्दा फिर राष्ट्रीय चर्चा में आ गया है। मानवाधिकार संगठनों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि यह प्रथा महिलाओं और बच्चियों के स्वास्थ्य तथा अधिकारों पर गंभीर प्रभाव डालती है। दुनिया के कई देशों में इस पर प्रतिबंध लगाया जा चुका है और अब भारत में भी इस विषय पर कानूनी तथा सामाजिक बहस तेज होती दिखाई दे रही है।
दि राइजिंग न्यूज डेस्क | 11 मई 2026 ।
देश में एक बार फिर महिला खतना को लेकर बहस तेज हो गई है। हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय में इस प्रथा को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की गई, जिसके बाद यह मुद्दा राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन गया है। न्यायालय ने स्पष्ट संकेत दिया कि धार्मिक स्वतंत्रता के नाम पर किसी भी ऐसी परंपरा को उचित नहीं ठहराया जा सकता जो स्वास्थ्य, नैतिकता और मौलिक अधिकारों को प्रभावित करती हो। महिला अधिकार संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इस प्रथा पर पूर्ण प्रतिबंध की मांग को और तेज कर दिया है। वहीं कुछ समुदाय इसे अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा का हिस्सा बताते हुए इसका समर्थन भी कर रहे हैं, जिससे यह मुद्दा और अधिक संवेदनशील बन गया है।
क्या है महिला खतना और क्यों है विवादित
महिला खतना उस प्रक्रिया को कहा जाता है जिसमें गैर चिकित्सीय कारणों से महिलाओं या बच्चियों के निजी अंगों में बदलाव या आंशिक कटाव किया जाता है। यह प्रक्रिया आमतौर पर कम उम्र की लड़कियों पर की जाती है और कई देशों में इसे परंपरा के रूप में देखा जाता रहा है। मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि यह प्रक्रिया शारीरिक और मानसिक रूप से गंभीर प्रभाव डाल सकती है। यही कारण है कि दुनिया के कई देशों और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने इसे मानवाधिकारों के उल्लंघन से जोड़कर देखा है।
मानवाधिकार उल्लंघन के रूप में क्यों देखा जाता है
अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य और महिला अधिकार संगठनों का मानना है कि महिला खतना महिलाओं की स्वतंत्रता और गरिमा के खिलाफ है। विशेषज्ञों का कहना है कि अधिकांश मामलों में यह प्रक्रिया नाबालिग बच्चियों पर की जाती है, जो इसके लिए सही मायनों में सहमति देने की स्थिति में नहीं होतीं। आलोचकों के अनुसार, यह केवल स्वास्थ्य का मुद्दा नहीं बल्कि बाल अधिकारों और महिला सम्मान से भी जुड़ा विषय है। इसी वजह से संयुक्त राष्ट्र और कई वैश्विक संस्थाएं लगातार इस प्रथा को समाप्त करने की मांग करती रही हैं।
स्वास्थ्य पर पड़ने वाले गंभीर प्रभाव
चिकित्सा विशेषज्ञों का कहना है कि महिला खतना का कोई चिकित्सीय लाभ सिद्ध नहीं हुआ है। इसके उलट यह प्रक्रिया कई गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बन सकती है। तत्काल प्रभावों में अत्यधिक दर्द, संक्रमण, रक्तस्राव और कई बार जान का खतरा तक शामिल हो सकता है। वहीं लंबे समय में महिलाओं को मानसिक तनाव, अवसाद, प्रसव संबंधी जटिलताओं और अन्य शारीरिक परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है।
लैंगिक असमानता से जुड़ा बड़ा मुद्दा
कई सामाजिक शोधकर्ताओं का मानना है कि महिला खतना पितृसत्तात्मक सोच और महिलाओं पर सामाजिक नियंत्रण से जुड़ा हुआ है। आलोचकों के अनुसार, यह प्रथा महिलाओं की स्वतंत्रता और उनके व्यक्तिगत अधिकारों को सीमित करने का माध्यम बनती रही है। महिला अधिकार समूहों का कहना है कि यह प्रथा महिलाओं के प्रति भेदभाव को बढ़ावा देती है और समाज में लैंगिक असमानता को मजबूत करती है। इसी कारण इसे महिलाओं के अधिकारों के खिलाफ एक गंभीर सामाजिक समस्या माना जाता है।
दुनिया भर में बढ़ा विरोध और कानूनी कार्रवाई
पिछले कुछ वर्षों में कई देशों ने महिला खतना के खिलाफ सख्त कानून बनाए हैं। अफ्रीका, यूरोप और एशिया के अनेक देशों में इस प्रथा पर प्रतिबंध लगाया जा चुका है या इसे सीमित करने के लिए कानूनी कदम उठाए गए हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जागरूकता अभियान भी लगातार चलाए जा रहे हैं ताकि लोगों को इसके दुष्प्रभावों के बारे में जानकारी दी जा सके। संयुक्त राष्ट्र सहित कई वैश्विक संस्थाएं इसे पूरी तरह समाप्त करने के लिए लगातार प्रयास कर रही हैं।
सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणी के बाद बढ़ी बहस
सर्वोच्च न्यायालय की हालिया टिप्पणी के बाद भारत में भी यह मुद्दा फिर चर्चा के केंद्र में आ गया है। अदालत ने संकेत दिया कि मौलिक अधिकारों और स्वास्थ्य से जुड़े मामलों में धार्मिक परंपराओं की भी सीमाएं तय होती हैं। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में इस विषय पर बड़ा संवैधानिक और सामाजिक विमर्श देखने को मिल सकता है। महिला अधिकार संगठनों ने भी अदालत की टिप्पणी का स्वागत किया है।
महिला खतना का मुद्दा केवल परंपरा या धर्म तक सीमित नहीं है, बल्कि यह स्वास्थ्य, मानवाधिकार और महिलाओं की गरिमा से जुड़ा गंभीर विषय बन चुका है। सर्वोच्च न्यायालय में उठी बहस ने इस विषय को एक बार फिर राष्ट्रीय चर्चा के केंद्र में ला दिया है। आने वाले समय में इस प्रथा को लेकर कानूनी, सामाजिक और धार्मिक स्तर पर बहस और तेज होने की संभावना है। विशेषज्ञों का मानना है कि महिलाओं के अधिकारों और सुरक्षा को प्राथमिकता देना किसी भी आधुनिक समाज की सबसे बड़ी जिम्मेदारी होनी चाहिए।