ट्रंप-नेतन्याहू रिश्तों में आई दरार
ईरान के साथ हुए शांति समझौते के बाद अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के रिश्तों में तनाव खुलकर सामने आ गया है। दोनों नेता अब युद्ध और शांति को लेकर अलग-अलग रणनीतियों पर चलते दिखाई दे रहे हैं।
दि राइजिंग न्यूज़ | वाशिंगटन | 20 जून 2026
ईरान डील के बाद बदल गए समीकरण
कुछ महीने पहले तक अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू को मध्य पूर्व की राजनीति में सबसे मजबूत सहयोगी माना जाता था। दोनों नेताओं ने ईरान के खिलाफ सख्त रुख अपनाया और उसके परमाणु कार्यक्रम तथा क्षेत्रीय प्रभाव को चुनौती देने की रणनीति पर साथ काम किया। लेकिन अब हालात पूरी तरह बदल चुके हैं।ईरान के साथ हुए शांति समझौते के बाद दोनों नेताओं के बीच मतभेद खुलकर सामने आ गए हैं। जो नेता कभी एक मंच से एक जैसी बातें करते थे, अब सार्वजनिक रूप से एक-दूसरे की आलोचना कर रहे हैं।
शांति समझौते ने बढ़ाई दूरी
अमेरिका ने पाकिस्तान और कतर की मध्यस्थता में ईरान के साथ एक अंतरिम शांति समझौता किया, जिसे बाद में "इस्लामाबाद मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग" का नाम दिया गया। इस समझौते का मुख्य उद्देश्य क्षेत्र में युद्ध को रोकना, होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खोलना और वैश्विक तेल आपूर्ति को सामान्य बनाना था।हालांकि इस पूरी प्रक्रिया में इजरायल की भूमिका बेहद सीमित रही। नेतन्याहू सरकार को उम्मीद थी कि अमेरिका किसी भी समझौते से पहले उनकी सुरक्षा चिंताओं और रणनीतिक सुझावों को महत्व देगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इससे इजरायल में नाराजगी बढ़ गई।
ट्रंप की प्राथमिकताएं क्यों बदलीं
युद्ध की शुरुआत में ट्रंप और नेतन्याहू दोनों ईरान पर दबाव बनाने के पक्ष में थे। लेकिन जैसे-जैसे संघर्ष लंबा खिंचता गया, ट्रंप की प्राथमिकताएं बदलने लगीं।अमेरिका में ऊर्जा कीमतों पर दबाव बढ़ रहा था। होर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव के कारण वैश्विक तेल बाजार प्रभावित हो रहे थे। इसके अलावा अमेरिकी जनता भी लंबे विदेशी युद्ध के पक्ष में नहीं थी। आगामी चुनावों को देखते हुए ट्रंप ने महसूस किया कि युद्ध जारी रखने के बजाय शांति स्थापित करना उनके लिए अधिक राजनीतिक लाभदायक होगा।इसी सोच के तहत उन्होंने युद्ध समाप्त करने और खुद को शांति स्थापित करने वाले नेता के रूप में प्रस्तुत करने की रणनीति अपनाई।
नेतन्याहू की अलग राजनीतिक मजबूरियां
दूसरी ओर इजरायल में प्रधानमंत्री नेतन्याहू घरेलू राजनीतिक दबावों का सामना कर रहे हैं। उनकी छवि लंबे समय से एक ऐसे नेता की रही है जो ईरान और उसके समर्थक संगठनों के खिलाफ सबसे कठोर रुख अपनाते हैं।इजरायल में आगामी चुनावों को देखते हुए नेतन्याहू नहीं चाहते कि उनके समर्थकों को यह संदेश जाए कि उन्होंने दबाव में आकर संघर्ष रोक दिया। इसी वजह से वह लगातार कहते रहे हैं कि ईरान समर्थित संगठनों के खिलाफ अभियान अभी समाप्त नहीं हुआ है।
लेबनान बना सबसे बड़ा विवाद
दोनों नेताओं के बीच सबसे बड़ा विवाद लेबनान को लेकर सामने आया। शांति समझौते में लेबनान की संप्रभुता का सम्मान करने और वहां सैन्य गतिविधियों को सीमित करने की बात कही गई थी।लेकिन इजरायल दक्षिणी लेबनान में अपनी सैन्य मौजूदगी बनाए रखना चाहता है। नेतन्याहू का तर्क है कि हिजबुल्लाह जैसे संगठनों से सुरक्षा के लिए यह आवश्यक है।वहीं ट्रंप की शांति योजना इस दृष्टिकोण से मेल नहीं खाती। ईरान ने भी चेतावनी दी कि यदि लेबनान में इजरायली कार्रवाई जारी रही तो वह समझौते से पीछे हट सकता है। इससे ट्रंप की पूरी कूटनीतिक पहल खतरे में पड़ गई।
सार्वजनिक मंचों पर भी दिखा टकराव
तनाव बढ़ने के साथ दोनों नेताओं के बीच बयानबाजी भी तेज हो गई। जी-7 शिखर सम्मेलन के दौरान ट्रंप ने सार्वजनिक रूप से इजरायल की सैन्य रणनीति की आलोचना की।उन्होंने कहा कि हर समस्या का समाधान बड़े पैमाने पर सैन्य कार्रवाई नहीं हो सकता। इस टिप्पणी को इजरायल की नीतियों पर सीधा हमला माना गया।अमेरिकी मीडिया रिपोर्टों के अनुसार एक फोन बातचीत के दौरान ट्रंप ने नेतन्याहू पर बेहद नाराजगी जताई और उनके रवैये की कड़ी आलोचना की। बाद में ट्रंप ने यह भी कहा कि अमेरिका के समर्थन के बिना इजरायल की स्थिति बेहद कठिन हो सकती है।
अमेरिकी नेतृत्व भी हुआ सक्रिय
अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने भी इस विवाद में ट्रंप का समर्थन किया। उन्होंने इजरायल को चेतावनी देते हुए कहा कि उसे अपने सबसे मजबूत सहयोगी के साथ टकराव से बचना चाहिए।यह बयान दिखाता है कि मतभेद अब केवल दो नेताओं तक सीमित नहीं रहे, बल्कि दोनों देशों के राजनीतिक नेतृत्व के बीच भी दिखाई देने लगे हैं।
पहले भी दिख चुका है तनाव
यह पहली बार नहीं है जब ट्रंप और नेतन्याहू के रिश्तों में खटास आई हो। ट्रंप के पहले कार्यकाल के अंत में भी दोनों नेताओं के बीच मतभेद सामने आए थे, जब नेतन्याहू ने अमेरिकी चुनाव परिणामों के बाद जो बाइडेन को बधाई दी थी।हालांकि मौजूदा विवाद कहीं अधिक गंभीर माना जा रहा है, क्योंकि यह व्यक्तिगत नाराजगी नहीं बल्कि युद्ध और शांति की रणनीति से जुड़ा मामला है।
भविष्य में क्या होंगे असर
अमेरिका और इजरायल के संबंध केवल दो नेताओं पर निर्भर नहीं करते। दोनों देशों के बीच सैन्य सहयोग, खुफिया साझेदारी और आर्थिक संबंध बेहद मजबूत हैं।फिर भी मौजूदा घटनाक्रम यह संकेत देता है कि ट्रंप और नेतन्याहू अब मध्य पूर्व की राजनीति को अलग-अलग नजरिए से देख रहे हैं। ट्रंप जहां क्षेत्र में स्थिरता और कूटनीतिक सफलता चाहते हैं, वहीं नेतन्याहू सुरक्षा चिंताओं और घरेलू राजनीति को प्राथमिकता दे रहे हैं।यही वजह है कि कभी सबसे करीबी माने जाने वाले दोनों नेताओं के बीच अब खुली रणनीतिक दूरी दिखाई देने लगी है, जिसका असर आने वाले समय में मध्य पूर्व की राजनीति पर भी पड़ सकता है।