यूरोप को अमेरिका की कड़ी चेतावनी

नाटो देशों की बैठक में अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने यूरोपीय देशों को अपनी सुरक्षा की जिम्मेदारी स्वयं उठाने की सलाह दी। उन्होंने संकेत दिया कि अमेरिका यूरोप में अपनी सैन्य मौजूदगी की समीक्षा करेगा और भविष्य में सहयोग की शर्तें बदल सकती हैं।

यूरोप को अमेरिका की कड़ी चेतावनी

दि राइजिंग न्यूज़ | वॉशिंगटन | 19 जून 2026

नाटो बैठक में अमेरिका का सख्त रुख

अमेरिका के रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने नाटो देशों की बैठक में यूरोपीय सहयोगियों को कड़ा संदेश देते हुए कहा कि अब समय आ गया है कि यूरोप अपनी सुरक्षा की जिम्मेदारी स्वयं संभाले। उन्होंने स्पष्ट किया कि अमेरिका यूरोप में अपनी सैन्य तैनाती और भूमिका की व्यापक समीक्षा करने जा रहा है और भविष्य में सैन्य सहयोग इस बात पर निर्भर करेगा कि यूरोपीय देश अपनी रक्षा क्षमताओं को कितना मजबूत बनाते हैं। ब्रुसेल्स में आयोजित नाटो रक्षा मंत्रियों की बैठक को संबोधित करते हुए हेगसेथ ने कहा कि यह समीक्षा केवल औपचारिक प्रक्रिया नहीं होगी बल्कि इसका उद्देश्य यह तय करना है कि बदलते वैश्विक हालात में अमेरिका और यूरोप के बीच सुरक्षा सहयोग किस दिशा में आगे बढ़ेगा।

यूरोपीय देशों पर लगाए गंभीर आरोप

पीट हेगसेथ ने दावा किया कि ईरान के खिलाफ संभावित सैन्य कार्रवाई के दौरान कुछ यूरोपीय देशों ने अमेरिकी सेना को अपने सैन्य अड्डों और हवाई मार्गों के उपयोग की अनुमति नहीं दी। उन्होंने इस रवैये को निराशाजनक और अस्वीकार्य बताया। उन्होंने कहा कि जब सहयोगी देश महत्वपूर्ण सुरक्षा मामलों में समर्थन नहीं देते तो इससे सैनिकों की सुरक्षा और सैन्य अभियानों की प्रभावशीलता पर असर पड़ता है। उनके बयान को नाटो के भीतर अमेरिका की बढ़ती नाराजगी के रूप में देखा जा रहा है।

रक्षा खर्च पर भी उठाए सवाल

अमेरिकी रक्षा मंत्री ने यूरोप की रक्षा नीतियों की आलोचना करते हुए कहा कि कई देशों ने रक्षा तैयारियों की बजाय सामाजिक और कल्याणकारी कार्यक्रमों पर अधिक ध्यान दिया। उन्होंने कहा कि टैंक, लड़ाकू विमान और वायु रक्षा प्रणालियों में निवेश बढ़ाने की आवश्यकता थी लेकिन कई देशों ने अपनी प्राथमिकताएं दूसरी दिशाओं में केंद्रित कर दीं। हालांकि नाटो महासचिव मार्क रूटे ने बैठक में बताया कि यूरोपीय देशों और कनाडा ने बीते वर्ष रक्षा बजट में लगभग 90 अरब डॉलर की अतिरिक्त वृद्धि की है। यह 2024 की तुलना में लगभग 20 प्रतिशत अधिक है।

हिंद प्रशांत क्षेत्र पर बढ़ रहा फोकस

हेगसेथ ने संकेत दिया कि अमेरिका अब अपनी सैन्य प्राथमिकताओं का पुनर्गठन कर रहा है। उन्होंने कहा कि भविष्य की रणनीति में हिंद प्रशांत क्षेत्र को विशेष महत्व दिया जाएगा, जहां चीन की बढ़ती गतिविधियों को लेकर अमेरिका सतर्क है।  यदि अमेरिका अपने संसाधनों का बड़ा हिस्सा हिंद प्रशांत क्षेत्र की ओर स्थानांतरित करता है तो यूरोप को अपनी सुरक्षा के लिए अधिक आत्मनिर्भर बनना होगा।

नाटो 3.0 की अवधारणा पर जोर

बैठक के दौरान हेगसेथ ने कहा कि ट्रंप प्रशासन नाटो को नए स्वरूप में विकसित करना चाहता है। उन्होंने इसे “नाटो 3.0” की संज्ञा देते हुए कहा कि गठबंधन को भविष्य की चुनौतियों के अनुरूप अधिक सक्षम और प्रभावी बनाना होगा। उनका कहना था कि बदलती भू-राजनीतिक परिस्थितियों में पारंपरिक सुरक्षा ढांचे को आधुनिक बनाने की आवश्यकता है ताकि गठबंधन किसी भी संभावित खतरे का सामना कर सके।

अनुच्छेद 5 को लेकर नई बहस

नाटो का अनुच्छेद 5 सामूहिक सुरक्षा का आधार माना जाता है। इसके तहत किसी एक सदस्य देश पर हमला पूरे गठबंधन पर हमला माना जाता है। हालांकि अमेरिका ने संकेत दिया है कि भविष्य में वह हर परिस्थिति में पहले जैसी व्यापक सैन्य सहायता स्वतः उपलब्ध नहीं कराएगा। इस संकेत के बाद यूरोपीय देशों के सैन्य नेतृत्व ने वैकल्पिक सुरक्षा योजनाओं पर काम शुरू कर दिया है। कई विशेषज्ञ इसे नाटो के इतिहास में एक महत्वपूर्ण बदलाव के रूप में देख रहे हैं।

परमाणु सुरक्षा पर कायम रहेगा सहयोग

हालांकि अमेरिका ने स्पष्ट कर दिया है कि यूरोप में तैनात अपने परमाणु हथियारों को हटाने की उसकी कोई योजना नहीं है। इन हथियारों को नाटो की सामूहिक सुरक्षा व्यवस्था का सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ माना जाता है। नाटो के न्यूक्लियर प्लानिंग ग्रुप ने 19 वर्षों बाद संयुक्त बयान जारी करते हुए कहा कि गठबंधन की परमाणु क्षमता उसकी सुरक्षा की सर्वोच्च गारंटी बनी रहेगी। सदस्य देशों ने परमाणु रणनीति के आधुनिकीकरण और सुरक्षा ढांचे को मजबूत करने पर भी सहमति व्यक्त की।

बदलते समीकरणों के संकेत

अमेरिकी रक्षा मंत्री के बयान ऐसे समय आए हैं जब वैश्विक सुरक्षा परिदृश्य तेजी से बदल रहा है। रूस-यूक्रेन युद्ध, चीन की बढ़ती शक्ति और मध्य पूर्व की अस्थिरता ने अंतरराष्ट्रीय गठबंधनों की भूमिका को नई दिशा दी है।  अमेरिका का यह रुख यूरोप के लिए चेतावनी भी है और अवसर भी। यदि यूरोपीय देश अपनी रक्षा क्षमताओं को मजबूत करते हैं तो वे भविष्य में अधिक स्वतंत्र और प्रभावशाली भूमिका निभा सकते हैं। वहीं यदि वे अमेरिका पर अत्यधिक निर्भर बने रहते हैं तो सुरक्षा संबंधी चुनौतियां और जटिल हो सकती हैं।