कनाडा की आबादी में लगातार गिरावट

कनाडा में लगातार तीसरी तिमाही जनसंख्या में गिरावट दर्ज की गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि इमिग्रेशन में कटौती और घटती जन्मदर इसके प्रमुख कारण हैं। इससे देश की अर्थव्यवस्था और श्रम बाजार पर भी असर पड़ सकता है।

कनाडा की आबादी में लगातार गिरावट

दि राइजिंग न्यूज़ | ओटावा | 19 जून 2026

इमिग्रेशन में कटौती का दिखने लगा असर

कनाडा की जनसंख्या में लगातार तीसरी तिमाही गिरावट दर्ज की गई है, जिससे देश की इमिग्रेशन नीति को लेकर नई बहस शुरू हो गई है। ताजा सरकारी आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2026 की पहली तिमाही में देश की आबादी में लगभग 55 हजार लोगों की कमी दर्ज की गई है। इसके साथ ही कुल जनसंख्या घटकर करीब 4 करोड़ 14 लाख रह गई है। यह गिरावट मुख्य रूप से इमिग्रेशन में कमी और लगातार घटती जन्मदर का परिणाम है। पिछले कई वर्षों से कनाडा की जनसंख्या वृद्धि का प्रमुख आधार प्रवासी रहे हैं, लेकिन अब सरकार द्वारा आव्रजन लक्ष्यों में कटौती करने से यह संतुलन प्रभावित होता दिखाई दे रहा है।

लगातार तीसरी तिमाही में कमी

स्टैटिस्टिक्स कनाडा द्वारा जारी आंकड़ों के मुताबिक देश की जनसंख्या में 0.1 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है। यह लगातार तीसरी तिमाही है जब आबादी में कमी देखने को मिली है। जनसांख्यिकी विशेषज्ञों के अनुसार यह स्थिति कनाडा जैसे विकसित देश के लिए चिंता का विषय है, क्योंकि यहां पहले से ही जन्मदर कम है और कार्यबल की जरूरतों को पूरा करने के लिए लंबे समय से प्रवासियों पर निर्भरता बनी हुई है।

स्थायी और अस्थायी प्रवासियों की संख्या घटी

इमिग्रेशन, रिफ्यूजीज़ एंड सिटिजनशिप कनाडा (IRCC) ने वर्ष 2026 के लिए अपने आव्रजन लक्ष्य में कटौती की है। सरकार का उद्देश्य वर्ष 2027 तक अस्थायी आबादी को कुल जनसंख्या के 5 प्रतिशत से नीचे लाना है। आंकड़ों के अनुसार जनवरी से अप्रैल 2026 के बीच केवल 83,149 नए स्थायी प्रवासी कनाडा पहुंचे। यह संख्या पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में 20.2 प्रतिशत कम है। इसके अलावा अस्थायी निवासियों की संख्या में भी बड़ी गिरावट दर्ज की गई है। रिपोर्ट के मुताबिक इस अवधि में लगभग 1.18 लाख अस्थायी निवासी कम हुए हैं।

जन्मदर भी बनी बड़ी चुनौती

मैकमास्टर विश्वविद्यालय के प्रोफेसर ब्रूस न्यूबोल्ड का कहना है कि कनाडा की जनसंख्या वृद्धि में आई यह कमी कोई अचानक हुई घटना नहीं है। उनके अनुसार बेबी बूम के दौर के बाद से देश में जन्मदर लगातार घटती रही है और अब यह प्रतिस्थापन स्तर से भी नीचे पहुंच चुकी है। इसका अर्थ है कि जितनी तेजी से नई पीढ़ी जन्म ले रही है, उससे अधिक गति से बुजुर्ग आबादी बढ़ रही है। उन्होंने कहा कि लंबे समय तक इमिग्रेशन ने इस कमी को संतुलित बनाए रखा, लेकिन अब आव्रजन में गिरावट के कारण वास्तविक जनसंख्या वृद्धि प्रभावित हो रही है।

अर्थव्यवस्था और रोजगार बाजार पर असर

 यदि यह रुझान लंबे समय तक जारी रहा तो कनाडा की अर्थव्यवस्था पर इसका असर पड़ सकता है। कई उद्योग पहले से ही कुशल कर्मचारियों की कमी का सामना कर रहे हैं। ऐसे में कम इमिग्रेशन का मतलब श्रम बाजार में उपलब्ध कार्यबल की संख्या में और कमी आना हो सकता है। भविष्य में स्वास्थ्य सेवा, निर्माण, तकनीक और सेवा क्षेत्रों में कर्मचारियों की मांग और बढ़ सकती है।

वर्क और स्टडी परमिट में भी कमी

इमिग्रेशन वकील शांटल डेसलॉग्स के अनुसार नई सरकारी नीतियों के कारण वर्क परमिट, स्टडी परमिट और फैमिली क्लास इमिग्रेशन में स्वीकृतियों की संख्या कम हुई है। उन्होंने बताया कि बढ़ती जीवन-यापन लागत, आवास संकट और सार्वजनिक दबाव को देखते हुए सरकार ने यह कदम उठाया है। हालांकि इसका असर कनाडा की वैश्विक आकर्षण क्षमता पर पड़ रहा है। उनके मुताबिक अब कई छात्र और पेशेवर कनाडा की बजाय ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका और ब्रिटेन जैसे देशों को प्राथमिकता देने लगे हैं।

प्रवासियों के लिए बढ़ीं चुनौतियां

हाल के महीनों में कई प्रवासियों ने वर्क परमिट और स्टडी परमिट प्रक्रियाओं में देरी की शिकायत की है। साथ ही रोजगार और स्थायी निवास के अवसर भी पहले की तुलना में सीमित होते दिखाई दे रहे हैं। इसी कारण कुछ लोग अपने मूल देशों में लौटने या अन्य देशों में बसने का विकल्प चुन रहे हैं। इससे कनाडा के लिए कुशल मानव संसाधन बनाए रखना और चुनौतीपूर्ण हो सकता है।

आगे क्या करेगी सरकार

अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या कनाडा सरकार भविष्य में फिर से इमिग्रेशन बढ़ाने की दिशा में कदम उठाएगी या मौजूदा सख्त नीति जारी रखेगी। फिलहाल सरकार आवास, स्वास्थ्य सेवाओं और बुनियादी ढांचे पर बढ़ते दबाव को कम करने के लिए सीमित इमिग्रेशन नीति को जारी रख सकती है। हालांकि यदि जनसंख्या और श्रम बाजार पर इसका नकारात्मक प्रभाव बढ़ता है तो आने वाले वर्षों में नीति में बदलाव की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता। कनाडा की जनसंख्या में आई यह गिरावट देश के लिए केवल एक सांख्यिकीय बदलाव नहीं है, बल्कि यह भविष्य की आर्थिक और सामाजिक चुनौतियों का संकेत भी मानी जा रही है।