व्हाट्सऐप डीपी से 7.8 करोड़ की ठगी

पूर्व प्रधानमंत्री इंद्र कुमार गुजराल के बेटे और पूर्व राज्यसभा सांसद नरेश गुजराल के नाम का इस्तेमाल कर साइबर ठगों ने उनकी कंपनी से करीब 7.8 करोड़ रुपये की ठगी कर ली। व्हाट्सऐप पर फर्जी प्रोफाइल बनाकर अधिकारियों को झांसे में लिया गया और कई दिनों तक रकम ट्रांसफर करवाई गई।

व्हाट्सऐप डीपी से 7.8 करोड़ की ठगी

दि राइजिंग न्यूज़ | नई दिल्ली | 19 जून 2026

पूर्व प्रधानमंत्री के परिवार को साइबर ठगों ने बनाया निशाना

देश में बढ़ते साइबर अपराधों के बीच एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है। पूर्व प्रधानमंत्री इंद्र कुमार गुजराल के पुत्र और पूर्व राज्यसभा सांसद नरेश गुजराल के नाम का दुरुपयोग कर साइबर ठगों ने उनकी कंपनी से करीब 7.8 करोड़ रुपये की ठगी कर ली। यह मामला इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि ठगों ने किसी तकनीकी हैकिंग के बजाय केवल व्हाट्सऐप प्रोफाइल और विश्वास का सहारा लेकर इतनी बड़ी रकम निकलवा ली। घटना ने यह साबित कर दिया है कि साइबर अपराधी अब आम नागरिकों के साथ-साथ देश की प्रमुख हस्तियों और बड़े कारोबारी प्रतिष्ठानों को भी निशाना बना रहे हैं।

व्हाट्सऐप प्रोफाइल बनाकर रची साजिश

जानकारी के अनुसार ठगों ने एक नया मोबाइल नंबर लेकर उसकी प्रोफाइल तस्वीर में नरेश गुजराल की फोटो लगा दी। इसके बाद कंपनी के एक वरिष्ठ अधिकारी को संदेश भेजे गए। प्रोफाइल तस्वीर और बातचीत के तरीके को देखकर अधिकारी को लगा कि संदेश वास्तव में नरेश गुजराल की ओर से भेजे जा रहे हैं। इसी विश्वास का फायदा उठाकर ठग ने तत्काल धनराशि ट्रांसफर करने के निर्देश दिए।

पहले 1.5 करोड़ फिर बढ़ती गई रकम

साइबर अपराधी ने शुरुआत में लगभग 1.5 करोड़ रुपये आरटीजीएस के माध्यम से एक बैंक खाते में भेजने को कहा। अधिकारी को कोई संदेह नहीं हुआ और उसने निर्देशों का पालन करते हुए रकम ट्रांसफर कर दी। इसके बाद अगले चार दिनों तक लगातार नए भुगतान के निर्देश आते रहे। अधिकारी यह मानकर रकम भेजता रहा कि वह कंपनी के शीर्ष नेतृत्व के आदेश का पालन कर रहा है। धीरे-धीरे विभिन्न किश्तों में कुल 7.8 करोड़ रुपये संबंधित बैंक खाते में भेज दिए गए।

बैंक को हुआ संदेह

इतनी बड़ी वित्तीय गतिविधि को देखकर बैंक अधिकारियों को संदेह हुआ। बैंक ने कंपनी के मुख्य वित्तीय अधिकारी (सीएफओ) से संपर्क कर लेनदेन के बारे में जानकारी ली। हालांकि सीएफओ ने भी यह समझा कि भुगतान के निर्देश नरेश गुजराल की ओर से ही दिए गए हैं। इसके चलते लेनदेन जारी रहे और ठग अपनी योजना को आगे बढ़ाने में सफल रहा।

बेटी से संपर्क के बाद खुला राज

मामले का खुलासा तब हुआ जब संबंधित अधिकारी को कुछ असामान्य महसूस हुआ। उसने नरेश गुजराल की बेटी दीक्षा गुजराल से संपर्क कर भुगतान संबंधी निर्देशों की पुष्टि करनी चाही। दीक्षा गुजराल ने जब यह जानकारी सुनी तो वह हैरान रह गईं क्योंकि उनके पिता ने ऐसा कोई निर्देश नहीं दिया था। इसके बाद परिवार और कंपनी को समझ में आया कि वे साइबर ठगी का शिकार हो चुके हैं।

पुलिस में दर्ज हुई शिकायत

घटना का पता चलते ही तत्काल पुलिस में शिकायत दर्ज कराई गई। 16 जून को ई-एफआईआर दर्ज कराई गई और दिल्ली पुलिस की विशेष साइबर इकाई ने जांच शुरू कर दी। पुलिस ने संबंधित बैंक खातों और लेनदेन की जानकारी जुटाकर धनराशि के प्रवाह को ट्रैक करना शुरू किया। साइबर विशेषज्ञों और वित्तीय जांचकर्ताओं की मदद से मामले की विस्तृत जांच की जा रही है।

4 करोड़ रुपये किए गए फ्रीज

जांच के दौरान पुलिस को एक महत्वपूर्ण सफलता मिली। अधिकारियों ने उस बैंक खाते की पहचान कर ली जिसमें ठगी की रकम जमा की गई थी। जानकारी के अनुसार करीब 4 करोड़ रुपये की राशि को ट्रेस कर लिया गया है और उसे फ्रीज कर दिया गया है। इससे उम्मीद बढ़ी है कि पीड़ित पक्ष को ठगी गई रकम का एक बड़ा हिस्सा वापस मिल सकता है। सामान्यतः ऐसे मामलों में अपराधी कुछ ही मिनटों में रकम को कई खातों में स्थानांतरित कर देते हैं, लेकिन इस मामले में बड़ी राशि मूल खाते में ही मौजूद मिली।

बढ़ता साइबर अपराध बना चुनौती

विशेषज्ञों का कहना है कि साइबर अपराधी अब केवल तकनीकी हैकिंग पर निर्भर नहीं हैं। वे सोशल इंजीनियरिंग, फर्जी पहचान और मनोवैज्ञानिक तरीकों का इस्तेमाल कर लोगों का विश्वास जीतते हैं और फिर आर्थिक नुकसान पहुंचाते हैं। व्हाट्सऐप, ईमेल और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का दुरुपयोग कर फर्जी पहचान बनाना ऐसे अपराधों का सबसे आम तरीका बन चुका है।

सतर्कता ही सबसे बड़ा बचाव

साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों ने सलाह दी है कि किसी भी वित्तीय लेनदेन से पहले निर्देश देने वाले व्यक्ति की पहचान स्वतंत्र रूप से सत्यापित करनी चाहिए। केवल प्रोफाइल फोटो, नाम या संदेश के आधार पर बड़े भुगतान नहीं किए जाने चाहिए। विशेष रूप से कंपनियों और संस्थानों को बड़ी रकम के ट्रांसफर के लिए बहुस्तरीय सत्यापन प्रणाली अपनाने की आवश्यकता है ताकि इस प्रकार की घटनाओं को रोका जा सके। यह मामला एक बार फिर दिखाता है कि डिजिटल युग में सतर्कता और सत्यापन की कमी कितनी बड़ी आर्थिक क्षति का कारण बन सकती है।