अल नीनो से बढ़ी सूखे की आशंका

भारतीय मौसम विज्ञान विभाग ने मॉनसून 2026 के दौरान औसत से कम वर्षा का अनुमान जताया है। मौसम विशेषज्ञों के अनुसार जुलाई से नवंबर के बीच अल नीनो का प्रभाव बढ़ने से देश के कई हिस्सों में सूखे जैसी स्थिति, कृषि संकट, जल संकट और महंगाई का खतरा पैदा हो सकता है।

अल नीनो से बढ़ी सूखे की आशंका

दि राइजिंग न्यूज़ | नई दिल्ली | 19 जून 2026

जुलाई से नवंबर तक चुनौतीपूर्ण रह सकता है मौसम

देश में दक्षिण-पश्चिम मॉनसून की शुरुआत के साथ ही मौसम वैज्ञानिकों ने आने वाले महीनों को लेकर चिंता जताई है। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) ने मॉनसून 2026 के दौरान सामान्य से कम बारिश होने का अनुमान व्यक्त किया है। विभाग के अनुसार इस वर्ष कुल वर्षा दीर्घकालिक औसत का लगभग 90 से 92 प्रतिशत रह सकती है, जिससे कई राज्यों में सूखे जैसी स्थिति बनने की आशंका बढ़ गई है। अभी तक अल नीनो का पूरा प्रभाव दिखाई नहीं दिया है, लेकिन जुलाई से नवंबर के बीच इसका असर काफी मजबूत हो सकता है। ऐसे में कृषि, जल संसाधन, बिजली उत्पादन और देश की अर्थव्यवस्था पर व्यापक प्रभाव पड़ने की संभावना है।

क्या है अल नीनो

अल नीनो एक वैश्विक जलवायु प्रणाली है जिसमें प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्सों का समुद्री जल सामान्य से अधिक गर्म हो जाता है। इस बदलाव के कारण वैश्विक मौसम चक्र प्रभावित होता है। सामान्य परिस्थितियों में पूर्वी प्रशांत क्षेत्र अपेक्षाकृत ठंडा रहता है और व्यापारिक हवाएं पूर्व से पश्चिम की ओर बहती हैं। लेकिन अल नीनो की स्थिति में ये हवाएं कमजोर पड़ जाती हैं या दिशा बदल लेती हैं। इसका सीधा असर भारत के दक्षिण-पश्चिम मॉनसून पर पड़ता है और बारिश कम होने लगती है।

कमजोर शुरुआत ने बढ़ाई चिंता

मॉनसून 2026 की शुरुआत अपेक्षाकृत धीमी रही है। जून के पहले पखवाड़े में देश के कई हिस्सों में सामान्य से काफी कम बारिश दर्ज की गई। महाराष्ट्र सहित कई राज्यों में वर्षा में 70 से 80 प्रतिशत तक की कमी देखी गई है। मध्य भारत और उत्तर भारत के कुछ हिस्सों में भी बारिश की कमी दर्ज की गई है। मौसम विभाग का अनुमान है कि जून माह में भी वर्षा सामान्य से नीचे रह सकती है। इससे खरीफ फसलों की बुवाई प्रभावित होने की आशंका बढ़ गई है।

जुलाई से सितंबर में दिख सकता है बड़ा असर

विशेषज्ञों के अनुसार अल नीनो अभी विकसित हो रहा है और इसका सबसे अधिक प्रभाव जुलाई, अगस्त और सितंबर के दौरान दिखाई दे सकता है। यही वह समय होता है जब मॉनसून अपने चरम पर होता है और देश के अधिकांश हिस्सों में सबसे अधिक वर्षा होती है। अंतरराष्ट्रीय मौसम एजेंसियों और वैज्ञानिक संस्थानों के अनुसार जुलाई और अगस्त में अल नीनो के सक्रिय होने की संभावना 80 से 90 प्रतिशत से अधिक है। यदि यह और मजबूत हुआ तो अगस्त और सितंबर में वर्षा में और कमी आ सकती है।

किसानों के सामने बढ़ सकती है मुश्किलें

भारत की बड़ी आबादी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कृषि पर निर्भर है। खरीफ मौसम में धान, मक्का, कपास, सोयाबीन, दालें और अन्य महत्वपूर्ण फसलों की खेती होती है। इन फसलों की सफलता काफी हद तक मॉनसून पर निर्भर करती है। कम वर्षा होने की स्थिति में फसलों की पैदावार प्रभावित हो सकती है। कृषि विशेषज्ञों का अनुमान है कि यदि वर्षा में उल्लेखनीय कमी रहती है तो खाद्यान्न उत्पादन में 10 से 15 प्रतिशत तक गिरावट आ सकती है। महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, राजस्थान, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना जैसे राज्यों में वर्षा आधारित खेती अधिक होती है। इसलिए इन क्षेत्रों के किसानों पर सबसे अधिक असर पड़ सकता है।

जल संकट गहराने की आशंका

कम बारिश का प्रभाव केवल खेती तक सीमित नहीं रहेगा। जलाशयों में पानी की कमी, भूजल स्तर में गिरावट और नदियों के जल प्रवाह में कमी जैसी समस्याएं भी सामने आ सकती हैं। देश के कई हिस्सों में पहले से ही पेयजल संकट की स्थिति बनी हुई है। यदि मॉनसून कमजोर रहता है तो शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में जल संकट और गंभीर हो सकता है। सिंचाई परियोजनाओं, उद्योगों और घरेलू जरूरतों के लिए पानी की उपलब्धता प्रभावित होने की आशंका भी जताई जा रही है।

बिजली उत्पादन पर पड़ सकता है असर

देश के कई जल विद्युत संयंत्र जलाशयों और नदियों के पानी पर निर्भर हैं। यदि वर्षा कम होती है तो बिजली उत्पादन क्षमता प्रभावित हो सकती है।

इसके अलावा तापमान बढ़ने से बिजली की मांग भी बढ़ेगी, जिससे ऊर्जा क्षेत्र पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि जल और ऊर्जा दोनों क्षेत्रों के लिए यह एक बड़ी चुनौती बन सकती है।

बढ़ सकती है महंगाई

कृषि उत्पादन में कमी आने का सीधा असर बाजार पर पड़ता है। सब्जियां, अनाज, दालें और अन्य खाद्य पदार्थ महंगे हो सकते हैं। खाद्य मुद्रास्फीति बढ़ने से आम लोगों के घरेलू बजट पर असर पड़ सकता है।

आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि यदि कृषि उत्पादन में बड़ी गिरावट आती है तो देश की विकास दर पर भी दबाव पड़ सकता है। ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रफ्तार धीमी पड़ने का खतरा भी बना रहेगा।

सरकार ने शुरू की तैयारियां

संभावित सूखे की स्थिति से निपटने के लिए केंद्र और राज्य सरकारों ने तैयारी शुरू कर दी है। विभिन्न जिलों में सूखा प्रबंधन योजनाएं तैयार की जा रही हैं। फसल बीमा योजनाओं को मजबूत बनाने और किसानों को समय पर सहायता पहुंचाने पर भी जोर दिया जा रहा है।

जल संरक्षण, सूक्ष्म सिंचाई तकनीकों और वैकल्पिक फसलों को बढ़ावा देने की रणनीतियों पर भी काम किया जा रहा है ताकि संभावित नुकसान को कम किया जा सके।

जलवायु परिवर्तन बढ़ा रहा चुनौती

मौसम वैज्ञानिकों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन के कारण चरम मौसम घटनाओं की आवृत्ति बढ़ रही है। अल नीनो जैसी घटनाएं अब पहले की तुलना में अधिक प्रभावशाली साबित हो सकती हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि भविष्य में जल संरक्षण, सूखा प्रतिरोधी फसलों का विकास, आधुनिक सिंचाई प्रणाली और मौसम आधारित कृषि प्रबंधन को प्राथमिकता देना आवश्यक होगा।

अगले पांच महीने महत्वपूर्ण

मौसम विभाग और वैज्ञानिक संस्थानों की निगाहें अब जुलाई से नवंबर के मौसम पैटर्न पर टिकी हुई हैं। यदि अल नीनो का प्रभाव अनुमान के अनुसार बढ़ता है तो देश को कृषि, जल और आर्थिक मोर्चों पर बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।

हालांकि विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि समय रहते प्रभावी तैयारी और वैज्ञानिक प्रबंधन के जरिए संभावित नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है। आने वाले पांच महीने देश के लिए बेहद महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं।